
ज्यादातर बच्चे क्यों हो रहे हैं फूड और धूल की एलर्जी के शिकार ? एक्सपर्ट्स ने बताएं कारण
एलर्जी भी शरीर की किसी चीज पर असामान्य प्रतिक्रिया है, जिस पर कुछ लोगों को असर होता है और कुछ को नहीं। इसमें जेनेटिक कारण भी शामिल हैं, यानी एलर्जी कभी-कभी परिवारों में भी चलती हैं।
बच्चों में बढ़ती फूड और धूल की एलर्जी के पीछे अकसर रोजमर्रा की कुछ आदतों और पर्यावरण को जिम्मेदार माना जाता है। लेकिन डॉक्टरों की माने तो मेडिकल भाषा में एक और टर्म है, जिसे हाइजीन हाइपोथेसिस के नाम से जाना जाता है, बच्चों की कमजोर इम्यूनिटी का कारण बन सकती है। बता दें, हाइजीन हाइपोथेसिस एक ऐसा सिद्धांत है जो कहता है कि बचपन में सूक्ष्मजीवों (कीटाणुओं, परजीवियों) के संपर्क में कमी होने की वजह से प्रतिरक्षा प्रणाली ठीक से विकसित नहीं हो पाती। जिसकी वजह से एलर्जी, अस्थमा और स्वप्रतिरक्षी (autoimmune) बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ऐसा प्रतिरक्षा प्रणाली के अति-संवेदनशील होने की वजह से होता है। आसान भाषा में समझें तो ऐसा माहौल जो जरूरत से ज्यादा साफ-सुथरा और सैनिटाइज्ड होने की वजह से त्वचा और सांस लेने वाली नलिकाएं सामान्य माइक्रोब्स (सूक्ष्म जीवों) के संपर्क में नहीं आ पातीं। जो आमतौर पर इम्युनिटी के अच्छी तरह विकसित होने के लिए जरूरी मानी गई है।

किन बच्चों में ज्यादा होती है यह समस्या
सीके बिड़ला हॉस्पिटल की डायरेक्टर नियोनेटोलॉजी और पीडियाट्रिक्स डॉ. पूनम सिदाना कहती हैं कि जिन बच्चों को बहुत ज्यादा प्रोटेक्ट करके रखा जाता है या जरूरत से ज्यादा साफ-सुथरे माहौल में रखा जाता है, उन्हें नेचुरल इम्युनिटी बूस्ट करने वाले तत्वों का एक्सपोजर नहीं मिलता। लेकिन जब बच्चे बाहर के वातावरण का सामना करते हैं, तो उनका शरीर इसके लिए पूरी तरह तैयार नहीं होता और असामान्य प्रतिक्रिया देने लगता है। एलर्जी भी शरीर की किसी चीज पर असामान्य प्रतिक्रिया है, जिस पर कुछ लोगों को असर होता है और कुछ को नहीं। इसमें जेनेटिक कारण भी शामिल हैं, यानी एलर्जी कभी-कभी परिवारों में भी चलती हैं।
एलर्जी के पीछे पर्यावरण भी एक कारण
एलर्जी के पीछे पर्यावरण भी एक बड़ी भूमिका निभाता है। हमारे घरों में इस्तेमाल होने वाले कई प्रोडक्ट्स में ऐसे केमिकल्स मौजूद होते हैं जो शरीर के लिए इरिटेंट का काम करते हैं। दिल्ली जैसे शहरों में वायु प्रदूषण बहुत ज्यादा होने की वजह से सांस से जुड़ी दिक्कतें और ज्यादा बढ़ जाती हैं। चाहे वो सब्जियां हो या मांस, खाने में भी कीटनाशक और रसायनों का इस्तेमाल सेहत पर बुरा असर डालता है। मांस के लिए पाले जाने वाले जानवरों को कई बार हॉर्मोन और एंटीबायोटिक्स दिए जाते हैं, ताकि उनकी ग्रोथ बढ़े या वो बीमार न पड़ें। लेकिन ये सब चीजें आखिरकार हमारे भोजन और पर्यावरण का हिस्सा बन जाती हैं। रिसर्च में तो यहां तक पाया गया है कि गर्भावस्था के दौरान भी भ्रूण के खून में प्रदूषक मौजूद रहते हैं यानी इन टॉक्सिन्स का असर बहुत शुरुआती उम्र से ही शुरू हो जाता है, जो आगे चलकर एलर्जी या अन्य दिक्कतों का कारण बन सकता है।
रेडी-टू-ईट फूड खाने की आदत
एक और बात बच्चों के खान-पान से जुड़ी है पहले माना जाता था कि बच्चे को नट्स, अंडे जैसी चीजें धीरे-धीरे और बाद में देनी चाहिए। लेकिन अब कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि अलग-अलग चीजें थोड़ी जल्दी शुरू करने से बच्चे का इम्यून सिस्टम उन्हें बेहतर तरीके से स्वीकार करना सीखता है। इसके अलावा आजकल के छोटे बच्चों को रेडी-टू-ईट फूड खाने की आदत पड़ने लगी है। भले ही ऐसे भोजन को हेल्दी या केमिकल-फ्री बताया जाए, लेकिन कई बार ये प्रोसेस्ड फूड भी एलर्जी के मामलों में बढ़ोतरी का कारण बन सकते हैं।
सी-सेक्शन से जन्मे बच्चों में एलर्जी का खतरा ज्यादा
गर्भावस्था में एंटीबायोटिक का अधिक इस्तेमाल और सिजेरियन डिलीवरी की बढ़ती संख्या भी बच्चों में एलर्जी का कारण बन सकती है। दरअसल, सी-सेक्शन से जन्मे बच्चों को मां के जन्म मार्ग (वेजाइनल फ्लोरा) के नेचुरल बैक्टीरिया का संपर्क नहीं मिल पाता, जो आंतों की सेहत और इम्युनिटी के लिए जरूरी होता है। इसके अलावा, बच्चों को देर से या बिल्कुल स्तनपान न कराना और जल्दी फॉर्मूला मिल्क देना भी आगे चलकर एलर्जी या फूड सेंसिटिविटी का कारण बन सकता है।
मधुकर रेनबो चिल्ड्रेन हॉस्पिटल की पीडियाट्रिशन, डॉ. मेधा के अनुसार बच्चों में खाने-पीने और धूल जैसी आम चीजों से एलर्जी बढ़ने की एक बड़ी वजह हमारी बदलती लाइफस्टाइल और पर्यावरणीय हालात हैं। बढ़ता शहरीकरण, ज्यादा प्रदूषण और प्राकृतिक माहौल से दूरी की वजह से बच्चों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ने लगी है, जिससे उनमें एलर्जी होने की संभावना बढ़ जाती है।
हाइजीन हाइपोथेसिस के अनुसार, बहुत ज्यादा सफाई या बचपन में कीटाणुओं से सीमित संपर्क में रहने से भी इम्युनिटी ठीक से विकसित नहीं हो पाती है। इससे शरीर बाद में धूल, परागकण या कुछ खाद्य पदार्थों जैसी हानिरहित चीजों पर भी तीव्र प्रतिक्रिया देने लगता है। इसके अलावा, आजकल के खान-पान में प्रोसेस्ड फूड्स का ज्यादा इस्तेमाल और फाइबर व नेचुरल फूड्स की कमी भी एलर्जी के मामलों में बढ़ोतरी कर रही है।
सलाह
एलर्जी का पता जल्दी लगाकर उसका सही समय पर इलाज करवाना बहुत जरूरी है। माता-पिता को बच्चों में अगर बार-बार छींक आना, त्वचा पर रैशेज होना या खाने के बाद पेट से जुड़ी दिक्कतें दिखें तो सतर्क हो जाना चाहिए। नियमित हेल्थ चेकअप, घर के अंदर की हवा को साफ और संतुलित भोजन की मदद से बच्चों की इम्युनिटी को मजबूत बनाकर रखा जा सकता है, जिससे एलर्जी का खतरा कम करने में मदद मिल सकती है।

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Manju Mamgainलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।


