होली के रंगों से कहीं 'सांस' तो नहीं फूल रही? जानें क्या है पल्मोनोलॉजिस्ट की सलाह

Mar 04, 2026 02:56 pm ISTManju Mamgain लाइव हिन्दुस्तान
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फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट के पल्मोनोलॉजिस्ट (फेफड़ा रोग विशेषज्ञ) डॉ. अवि कुमार कहते हैं कि अक्सर होली के बाद अस्पतालों में सांस की तकलीफ लेकर आने वाले मरीजों की तादाद बढ़ जाती है।

होली के रंगों से कहीं 'सांस' तो नहीं फूल रही? जानें क्या है पल्मोनोलॉजिस्ट की सलाह

होली खुशियों और रंगों का त्योहार है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हवा में उड़ता चटख लाल या हरा गुलाल आपकी सांसों के लिए कितना घातक हो सकता है? फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीट्यूट के पल्मोनोलॉजिस्ट (फेफड़ा रोग विशेषज्ञ) डॉ. अवि कुमार कहते हैं कि अक्सर होली के बाद अस्पतालों में सांस की तकलीफ लेकर आने वाले मरीजों की तादाद बढ़ जाती है। होली खेलने के लिए यूज किए जाने वाले रासायनिक रंग श्वसन स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकते हैं।

कहां छिपा है खतरा ?

बाजार में मिलने वाले चमकीले गुलाल सिर्फ रंग नहीं, बल्कि सिंथेटिक डाई, सीसा (Lead), क्रोमियम और पारा जैसे भारी तत्वों का मिश्रण होते हैं। जब ये सूक्ष्म कण सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंचते हैं, तो शरीर में निम्न प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं।

ब्रोंकोस्पाज्म (Bronchospasm): श्वासनलियों का अचानक सिकुड़ जाना, जिससे सांस लेना दूभर हो जाता है।

एक्यूट इन्फ्लेमेशन: श्वासनली में तीव्र जलन और सूजन।

हाइपॉक्सेमिया: गंभीर मामलों में रक्त में ऑक्सीजन का स्तर गिर जाना।

अस्थमा अटैक: पहले से फेफड़ों की बीमारी (Asthma/COPD) से जूझ रहे लोगों के लिए यह जानलेवा हो सकता है।

किन लोगों को है अधिक खतरा?

बच्चे, बुजुर्ग और अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) या अतिसंवेदनशीलता संबंधी विकारों से पीड़ित मरीज विशेष रूप से अधिक जोखिम में होते हैं। इन लोगों के लिए कम वेंटिलेशन वाले स्थानों में थोड़े समय का संपर्क भी खांसी, घरघराहट, सांस लेने में तकलीफ (डिस्प्निया) और गंभीर मामलों में रक्त में ऑक्सीजन की कमी (हाइपॉक्सेमिया) का कारण बन सकता है।

सेफ होली खेलने के लिए 'गोल्डन रूल्स'

रंगों का चुनाव: होली खेलने के लिए केवल फूलों, हल्दी, चंदन या 'फूड-ग्रेड' प्रमाणित हर्बल रंगों का ही उपयोग करें।

मास्क का उपयोग: यदि आप अस्थमा के मरीज हैं, तो भीड़ वाले स्थानों पर फेस मास्क पहनें। यह कणों को फेफड़ों तक जाने से रोकता है।

खुला वातावरण: बंद कमरों या कम वेंटिलेशन वाली जगहों की जगह खुले मैदानों में होली खेलें ताकि हवा में रंगों की सांद्रता कम रहे।

त्वरित स्वच्छता: उत्सव के तुरंत बाद रंग धो लें। त्वचा या बालों पर चिपके सूखे कण धीरे-धीरे सांस के जरिए अंदर जाते रहते हैं।

सलाह

डॉ. अवि कुमार कहते हैं कि होली रंगों का पर्व है, फेफड़ों की बीमारी का नहीं। जागरूकता ही सबसे बड़ा बचाव है। यदि आपको या आपके आसपास किसी को अचानक खांसी, घरघराहट या सांस फूलने की समस्या हो, तो इसे नजरअंदाज न करें और तुरंत चिकित्सकीय सहायता लें।

Manju Mamgain

लेखक के बारे में

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शॉर्ट बायो
मंजू ममगाईं पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर काम कर रही हैं।


परिचय एवं अनुभव
मंजू ममगाईं वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिख रही हैं। बीते साढ़े 6 वर्षों से इस महत्वपूर्ण भूमिका में रहते हुए उन्होंने न केवल डिजिटल कंटेंट के बदलते स्वरूप को करीब से देखा है, बल्कि यूजर बिहेवियर और पाठकों की बदलती रुचि को समझते हुए कंटेंट को नई ऊंचाइयों तक भी पहुंचाया है। पत्रकारिता के तीनों मुख्य स्तंभों— टीवी, प्रिंट और डिजिटल में कुल 18 वर्षों का लंबा अनुभव उनकी पेशेवर परिपक्वता का प्रमाण है।

करियर का सफर (प्रिंट की गहराई से डिजिटल की रफ्तार तक)
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