
हर महिला को पता होने चाहिए मैमोग्राम और ब्रेस्ट पेन से जुड़े इन मिथकों की सच्चाई, ये है डॉक्टर की सलाह
Breast Cancer Awareness Month 2025 : ज्यादातर मामलों में, करीब 80 प्रतिशत से ज्यादा बार, स्तनों में दर्द का कारण कैंसर नहीं होता है। ऐसा दर्द ज्यादातर इंफेक्शन (फोड़ा या पस बनने) की वजह से, हार्मोनल बदलावों से होने वाले फाइब्रोसिस्टिक चेंजेस के कारण, या फिर तनाव की वजह से होता है।
Myths VS. Facts Around Mammograms And Breast Pain : हर साल अक्टूबर माह में ब्रेस्ट कैंसर अवेयरनेस मंथ 2025 मनाया जाता है। यह खास दिन एक ग्लोबल हेल्थ केम्पैन है, जो महिलाओं के बीच ब्रेस्ट कैंसर से जुड़ी अवेयरनेस बढ़ाने, शुरुआती चेकअप को बढ़ावा देने, और ब्रेस्ट कैंसर से प्रभावित लोगों को सपोर्ट देने के लिए मनाया जाता है। इतना ही नहीं यह एक खास दिन लोगों को ब्रेस्ट कैंसर के लिए एजुकेट करने और हेल्दी लाइफ स्टाइल अपनाने के लिए प्रोत्साहित भी करता है। बात दें, इस दिन को मनाने के लिए हर साल एक नई थीम भी रखी जाती है। बात अगर इस साल की थीम की करें तो, इस साल की थीम 'मेरा कारण' (My Why) है। बहुत कम महिलाएं इस बात को जानती हैं कि ज्यादातर मामलों में, करीब 80 प्रतिशत से ज्यादा बार, स्तनों में दर्द का कारण कैंसर नहीं होता है। ऐसा दर्द ज्यादातर इंफेक्शन (फोड़ा या पस बनने) की वजह से, हार्मोनल बदलावों से होने वाले फाइब्रोसिस्टिक चेंजेस के कारण, या फिर तनाव की वजह से होता है। इसके अलावा कई बार सही फिटिंग की ब्रा या अंडरगारमेंट्स भी दर्द का कारण बन सकते हैं। आज ब्रेस्ट हेल्थ के बारे में बहुत सारे मिथक और गलतफहमियां, खासकर मैमोग्राफी और ब्रेस्ट दर्द को लेकर महिलाओं को अपना शिकार बना रही हैं। बता दें, कैंसर से जुड़ा हुआ स्तन दर्द आमतौर पर बाद के या एडवांस स्टेज में होता है। शुरुआती स्टेज में ब्रेस्ट कैंसर ज्यादातर दर्दरहित होता है। ऐसे में इस खास माह मैमोग्राफी से जुड़े कुछ मिथकों और उनसे जुड़ी सच्चाई की हकीकत जानने के लिए हमने बात की सीके बिड़ला हॉस्पिटल के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी, डॉ. मनदीप सिंह मल्होत्रा और रोजवॉक बाय रेनबो हॉस्पिटल्स की कंसल्टेंट ब्रेस्ट कैंसर सर्जन,डॉ. शेफाली अग्रवाल से।

मैमोग्राफी से जुड़े मिथक और उनकी सच्चाई
मिथक- मैमोग्राफी में इस्तेमाल होने वाली रेडिएशन की मात्रा अधिक
सच्चाई- यह एक आम मिथक है कि मैमोग्राफी में इस्तेमाल होने वाली रेडिएशन की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। जबकि हकीकत में मैमोग्राम में मिलने वाली रेडिएशन की मात्रा बहुत कम होती है, जो प्राकृतिक परिवेश से मिलने वाले रेडिएशन या सामान्य एक्स-रे से भी कम है, और कैंसर का शीघ्र पता लगाने के लाभ इस न्यूनतम जोखिम से कहीं ज्यादा हैं, इसलिए मैमोग्राफी में रेडिएशन का डर नहीं होना चाहिए।
मिथक- क्या मैमोग्राफी दर्दनाक होती है।
सच्चाई- मैमोग्राफी ज्यादा दर्दनाक नहीं होती है, लेकिन इमेजिंग के दौरान दबाव पड़ने से हल्का असहज महसूस हो सकता है। आम तौर पर सलाह दी जाती है कि पीरियड्स के एक हफ्ते बाद मैमोग्राफी करवाई जाए, जब ब्रेस्ट सबसे कम टाइट और कोमल होते हैं। अगर ब्रेस्ट में पहले से दर्द या टेंडरनेस है, तो जरूरत न हो तो उस समय टेस्ट टाल देना बेहतर होता है।
मिथक- मैमोग्राफी के लिए सही उम्र 20 के बाद
सच्चाई- मैमोग्राफी की सलाह डॉक्टर आम तौर पर 40 या 45 साल की उम्र के बाद ही देते हैं। इसके पीछे वजह यह है कि कम उम्र में महिलाओं के ब्रेस्ट ज्यादा डेंस होते हैं यानी उनमें दूध बनाने वाले टिश्यू ज्यादा होते हैं। मेनोपॉज के करीब या स्तनपान के बाद ये टिश्यू धीरे-धीरे कम हो जाते हैं और उनकी जगह फैट ले लेता है, जिससे मैमोग्राफी ज्यादा असरदार हो जाती है।
मिथक- डेंस ब्रेस्ट में मैमोग्राफी की जाए तो उसका फायदा होता है।
सच्चाई- अगर बहुत जल्दी, यानी डेंस ब्रेस्ट में मैमोग्राफी की जाए तो उसका फायदा कम होता है। इसलिए महिलाओं को अकसर 45 साल के आसपास से स्क्रीनिंग शुरू करने की सलाह दी जाती है। हालांकि, जिन महिलाओं को रिस्क ज्यादा है, वो 40 की उम्र से भी शुरू कर सकती हैं।
मिथक- मैमोग्राफी 100 प्रतिशत परफेक्ट होती है।
सच्चाई- बता दें, मैमोग्राफी 100 प्रतिशत परफेक्ट नहीं होती है, इसे करवाने वाली महिलाओं के कभी-कभी फॉल्स पॉजिटिव या फॉल्स नेगेटिव रिजल्ट भी आ सकते हैं, यानी कोई असामान्यता छूट भी सकती है या गलत अलार्म भी बज सकता है। इसलिए रेग्युलर स्क्रीनिंग बहुत जरूरी है।
मिथक- क्या मास्टाल्जिया ब्रेस्ट कैंसर का संकेत
सच्चाई- ब्रेस्ट कैंसर से जुड़ा एक और आम मिथक ये है कि ब्रेस्ट दर्द, जिसे मास्टाल्जिया कहा जाता है, कैंसर का संकेत होता है। असल में, ज्यादातर ब्रेस्ट दर्द हार्मोन्स, पीरियड्स साइकिल या फाइब्रोसिस्टिक जैसी सामान्य और हानिरहित स्थितियों की वजह से होता है। गैर-साइक्लिकल दर्द चोट, संक्रमण या मांसपेशियों की समस्याओं से हो सकता है, लेकिन ये बहुत कम ही कैंसर का संकेत देता है। कुछ लोग सोचते हैं कि सिर्फ जिन महिलाओं में लक्षण हैं, उन्हें ही मैमोग्राफी करवानी चाहिए। लेकिन 40 साल और उससे ऊपर की सभी महिलाओं के लिए सालाना नियमित स्क्रीनिंग मैमोग्राफी और ब्रेस्ट अल्ट्रासाउंड की सिफारिश की जाती है, चाहे उन्हें दर्द या गांठ न भी हो।
मिथक- घने ब्रेस्ट टिश्यू पर मैमोग्राफी काम नहीं करती
सच्चाई- कहा जाता है कि घना ब्रेस्ट टिश्यू होने पर मैमोग्राफी काम नहीं करती है। बता दें, ब्रेस्ट के घना टिश्यू पहचान को थोड़ा मुश्किल बना सकता है, लेकिन डिजिटल मैमोग्राफी और सप्लीमेंटल अल्ट्रासाउंड जैसी आधुनिक इमेजिंग तकनीकें सटीकता बढ़ाती हैं। इन बातों को जानने से महिलाएं स्क्रीनिंग के बारे में सही निर्णय ले सकती हैं और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह ले सकती हैं, जिससे ब्रेस्ट हेल्थ बनी रहती है और अनावश्यक चिंता कम होती है।
ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग तीन स्टेप्स में होती है-
-महिला द्वारा खुद का ब्रेस्ट एग्ज़ामिनेशन
-डॉक्टर द्वारा क्लीनिकल एग्जामिनेशन
-मैमोग्राफी के जरिए रेडियोलॉजिकल स्क्रीनिंग
सलाह
अगर महिला से कुछ मिस हो जाए, तो डॉक्टर पकड़ सकते हैं, और अगर दोनों से भी छूट जाए, तो मैमोग्राफी शुरुआती (नॉन-पैलपेबल) स्टेज पर पकड़ सकती है। यही असली फायदा है जब इसे एक नियमित और लगातार चलने वाली स्क्रीनिंग के रूप में किया जाए, न कि सिर्फ एक बार के टेस्ट की तरह।

लेखक के बारे में
Manju Mamgainलेटेस्ट Hindi News , बॉलीवुड न्यूज, बिजनेस न्यूज, टेक , ऑटो, करियर , और राशिफल, पढ़ने के लिए Live Hindustan App डाउनलोड करें।




