सूखे मेवे, बताशे और सूखी रोटी.. कभी दुल्हन के सफर का सहारा थे कलीरे, जानें कैसे बनें ब्राइडल स्टेटमेंट!
आज के समय में भले ही कलीरे स्टाइल और फैशन का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन इसकी शुरुआत बहुत साधारण वजह से हुई थी। कभी ये दुल्हन के लंबे सफर में उसका सहारा हुआ करते थे। आइए जानते हैं कलीरा का दिलचस्प सफर।

शादी के दिन दुल्हन के हाथों में झिलमिलाते कलीरे तो आप सभी ने देखे होंगे। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस कलीरे से जुड़ी कहानी क्या है? कलीरा सिर्फ एक गहना नहीं होता, बल्कि हर दुल्हन की एक खूबसूरत कहानी का हिस्सा होता है। इसकी हर लटकन में प्यार छिपा होता है और हर छनक में दुआएं सुनाई देती हैं। आज के समय में भले ही कलीरे स्टाइल और फैशन का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन इसकी शुरुआत बहुत साधारण वजह से हुई थी। कभी ये दुल्हन के लंबे सफर में उसका सहारा हुआ करते थे। समय बदला, रास्ते बदले, फैशन बदला, लेकिन कलीरों की भावनाएं आज भी वैसी ही हैं। आइए जानते हैं कलीरा का दिलचस्प सफर, जो खाने की चीजों से शुरू होकर डिजाइनर ज्वेलरी तक पहुंचा।
कलीरों की शुरुआत की कहानी
पुराने समय में शादी के बाद दुल्हन को अपने नए घर तक जाने के लिए लंबा सफर तय करना पड़ता था। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल और राजस्थान जैसे इलाकों में रास्ते आसान नहीं थे। ना गाड़ियां थीं और न ही सफर में आराम की सुविधा। कई बार तो कई घंटों का रास्ता तय कर के दुल्हन अपने ससुराल पहुंचती थी। इसी वजह से दुल्हन के हाथों में खाने की छोटी-छोटी चीजें बांध दी जाती थीं। यही आगे चलकर कलीरे कहलाए। उस समय कलीरे सजावट के लिए नहीं, बल्कि जरूरत के लिए होते थे। यह दुल्हन की सेहत और सुरक्षा का एक सरल तरीका था।
बड़े दिलचस्प होते थे पुराने समय के कलीरे
पहले कलीरे बहुत साधारण और खाने की चीजों से तैयार होते थे। इनमें बताशा, मिश्री, भुना चना, सूखे मेवे और सूखी रोटी की छोटी गोलियां बांधी जाती थीं। बताशा हल्की मिठाई होती है जो जल्दी खराब नहीं होती। सफर में दुल्हन को भूख लगे तो वह तुरंत मीठा खा सके। मिश्री भी इसीलिए बांधी जाती थी। भुना चना पेट भरने के काम आता था। बादाम, काजू या मूंगफली जैसे सूखे मेवे ताकत के लिए रखे जाते थे। सूखी रोटी की छोटी गोलियां इस बात का सहारा थीं कि अगर रास्ते में कुछ ना मिले तो दुल्हन भूखी न रहे। इसके अलावा इन सब चीजों के साथ एक भावना भी जुड़ी होती थी। मीठा नई जिंदगी की मिठास का संकेत था और सूखे मेवे घर की बरकत का प्रतीक माने जाते थे।
समय के साथ कलीरा में आया बदलाव
जैसे-जैसे समय बीतता गया कलीरे में बदलाव आने लगा। आज के समय में कलीरा जरूरत की नहीं बल्कि फैशन और ट्रेंड की चीज बन चुका है। जब सफर आसान हो गया और गाड़ियां आने लगीं, तब खाने वाले कलीरों की जरूरत कम हो गई। इसलिए धीरे-धीरे इनका रूप बदलने लगा। बताशों की जगह मोती लगने लगे। चने की जगह रंगीन सजावट जुड़ गई। मिश्री की जगह चमकीले मनके आने लगे। सूखी रोटी की गोलियों की जगह जरी और खूबसूरत टैसल्स लग गए। कलीरे अब जरूरत से ज्यादा सजावट और स्टाइल का हिस्सा बन गए।
कलीरा ड्रॉपिंग की रस्म
कलीरों से जुड़ी एक प्यारी रस्म भी होती है। दुल्हन अपनी सहेलियों और बहनों के सिर के ऊपर कलीरे झटकती है। माना जाता है कि जिस लड़की पर कलीरे का टुकड़ा गिरता है, अगली दुल्हन वही होती है। यह एक खुशियों से भरी रस्म होती है, जो शादी के माहौल को और भी खास बना देती है।
मॉडर्न ब्राइड और उनके कलीरे
आज की दुल्हन अपने कलीरों को अपने पूरे लुक का अहम हिस्सा मानती है। गोल्डन डिजाइन, मोती, झुमकी स्टाइल और लंबे कलीरे काफी पसंद किए जाते हैं। ये सुबह से रात तक दुल्हन के लुक को खास बनाते हैं। कलीरे अब डिजाइनर ज्वेलरी बन चुके हैं। दुल्हन अपने लहंगे और गहनों के हिसाब से कलीरे चुनती है। कुछ हल्के और सादे डिजाइन पसंद करती हैं, तो कुछ भारी और रॉयल लुक वाले कलीरे पहनना चाहती हैं।
कलीरे से जुड़ी भावना आज भी है वही
कलीरा भले ही मॉडर्न बन चुका है लेकिन उससे जुड़ी भावना आज भी वही है। आज भी कलीरे दुल्हन की बहनें, कजिन्स और भाभियां ही बांधती हैं। यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि प्यार जताने का तरीका है। हर गांठ में दुआ होती है। कलीरे अब खाए नहीं जाते लेकिन उनका मतलब आज भी वही है। दुल्हन खुश रहे, सुरक्षित रहे और उसकी नई जिंदगी मिठास से भरी रहे। यही कलीरों की असली पहचान है।
(Images Credit: Pinterest)
लेखक के बारे में
Anmol Chauhanअनमोल चौहान लाइव हिन्दुस्तान (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में टकंटेंट प्रोड्यूसर हैं। वह लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए हेल्थ, रिलेशनशिप, फैशन, ट्रैवल और कुकिंग टिप्स से जुड़े विषयों पर लिखती हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए रीडर-सेंट्रिक और सरल भाषा में उपयोगी जानकारी प्रस्तुत करना उनके लेखन की खास पहचान है।
करियर की शुरुआत
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अनमोल चौहान ने दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास और राजनीति विज्ञान में स्नातक (BA) की पढ़ाई की है। इसके बाद उन्होंने भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC) से हिंदी पत्रकारिता में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया। इस अकादमिक पृष्ठभूमि ने उन्हें सामाजिक समझ, फैक्ट-बेस्ड रिपोर्टिंग और जिम्मेदार पत्रकारिता की मजबूत नींव दी।
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