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कश्मीर की कानी शॉल से पीएम मोदी को है खास लगाव, जानें क्या है इसकी खासियत

Speciality of Kani Shawl: कानी शॉल का इतिहास मुगलों जितना ही पुराना माना जाता है। इस शॉल की खासियत है कि इसे बनाने में महीने से लेकर साल भर से ज्यादा का वक्त भी लग जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं पीएम मोदी की पसंदीदा कानी पश्मीना शॉल में आखिर ऐसा क्या खास है।

Manju Mamgain लाइव हिन्दुस्तानFri, 21 June 2024 11:18 AM
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Speciality of Kani Shawl: आज भारत अपना 10वां योग दिवस मना रहा है। योग के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीनगर में लोगों के साथ मिलकर योग का अभ्यास किया। बात अगर पीएम मोदी की पसंदीदा चीजों की करें तो पीएम मोदी को श्रीनगर की खूबसूरत वादियां ही नहीं बल्कि यहां की रंग-बिरंगी शॉल भी काफी पसंद हैं। उनकी पसंदीदा शॉल में सबसे ज्यादा कानी शॉल का नाम लिया जाता है। बता दें, कानी शॉल का इतिहास मुगलों जितना ही पुराना माना जाता है। इस शॉल की खासियत है कि इसे बनाने में महीने से लेकर साल भर से ज्यादा का वक्त भी लग जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं पीएम मोदी की पसंदीदा कानी पश्मीना शॉल में आखिर ऐसा क्या खास है ।

क्या होता है कानी का मतलब?

पश्मीना ऊन से बनने वाली इस शॉल को बनाने के लिए लकड़ी की सलाइयों का इस्तेमाल किया जाता है, जिन्हें कश्मीरी भाषा में 'कानी' के नाम से जाना जाता है। कानी बुनाई के शिल्प में लकड़ी की छोटी सुइयों का उपयोग किया जाता है जिन्हें 'कनिस' कहा जाता है। शॉल के ऊपर जादुई पैटर्न बनाने के लिए कनिस के चारों ओर रंगीन धागे घुमाए जाते हैं। कनिस 'पूस तुल' नाम की जंगली लकड़ी से बने होते हैं। बता दें, पहली बार फारसी और तुर्की बुनकर इस कला को 15वीं शताब्दी में कश्मीर लाए थे।

क्यों है इतनी मंहगी कानी पश्मीना शॉल?

कानी पश्मीना शॉल को तैयार करने में 3-4 साल का वक्त लगता है। यह शॉल तैयार होने से पहले 3-4 कारीगरों के हाथों से होकर गुजरती है। इस दौरान कारीगरों को 6-7 घंटे काम करना होता है। शॉल की डिजाइन के अनुसार कारीगरों को इसे बनाने में समय लगता है। बावजूद इसके औसतन एक दिन में यह शॉल 1-2 सेंटीमीटर ही बनकर तैयार हो पाती है।

Speciality of Kani shawl

क्या है कानी पश्मीना शॉल की खासियत?

कानी शॉल लंबे वक्त से भारत के राजा-महाराजाओं की पोशाक में शामिल रही है। यहां तक की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कंधे पर भी यह शॉल कई बार नजर आ चुकी है। कानी शॉल की बुनाई बहुत हद तक कालीन की बुनाई की तरह होती है। इसमें इस्तेमाल की जानेवाली सामग्री कश्मीरी पश्मीना का हाईग्रेड होता है जो लद्दाख में मिलता है। कानी बुनाई के लिए डिजाइन शॉल पर एक कोडित भाषा में लिखा जाता है, जिसे 'तालिम' कहा जाता है। एक ग्राफ पेपर पर मास्टर बुनकर तालीमगुरु कोडित पैटर्न तैयार करते हैं। इस शॉल की खासियत यह है कि यह पतली सी शॉल आपके पसीने छुड़ा सकती है। इस शॉल को ओढ़ने के बाद आपको स्वेटर पहनने की जरूरत नहीं पड़ती है।

शॉल पर बनाए जाते हैं ये फेमस कश्मीर डिजाइन-

इस शॉल को बनाने के लिए दुनिया के सबसे पतले रेशम के धागे से काम किया जाता है। इस शॉल पर कढ़ाई करने के बाद आपको लगेगा मानो यह कोई पेंटिंग है। शॉल पर किए जाने वाले बारीक काम की वजह से 2 घंटे से ज्यादा कारीगर इस शॉल को बनाने का काम नहीं कर पाते हैं, वरना आंखों पर बुरा असर पड़ने लगता है। यही वजह है कि इसे बनाने में वक्त भी ज्यादा लगता है। एक शॉल का वजन 150 से 180 ग्राम तक होता है। शॉल में धागे से पीकॉक,फूलों की कढ़ाई के अलावा फ्लोरल और राजा महाराजा वाला महल डिजाइन भी बनाया जाता है।

धोते समय इन बातों का रखें ध्यान-

इस शॉल को धोने के लिए डिटर्जेंट पाउडर का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। ऐसा करने से यह खराब हो जाती है। इसे धोने के लिए आप इजी वॉश का यूज कर सकते हैं। इसके अलावा रात भर इस शॉल को गर्म पानी में भिगोकर रखने से भी इसमें लगे दाग साफ हो जाते हैं। इसके अलावा इस शॉल को धोने के बाद धूप में नहीं बल्कि छाया में सुखाया जाता है। वरना इसके रंग उड़ जाते हैं। बात अगर इस शॉल की कीमत की करें तो यह शॉल 13 हजार रुपए से शुरू होकर 1 लाख रुपए तक की हो सकती है।

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