स्टाइलिश दिखना है जरूरी, पर बालों की सेहत से समझौता क्यों? डर्मेटोलॉजिस्ट ने बताया साल में कितनी बार करें हेयर कलर

Mar 09, 2026 08:04 pm ISTManju Mamgain लाइव हिन्दुस्तान
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Safe Number Of Times To Dye Hair : शारदाकेयर-हेल्थसिटी के डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. शितिज गोयल कहते हैं कि बालों को नियमित रूप से कलर करना सिर्फ एक आदत तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध आपके बालों और स्कैल्प के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है।

स्टाइलिश दिखना है जरूरी, पर बालों की सेहत से समझौता क्यों? डर्मेटोलॉजिस्ट ने बताया साल में कितनी बार करें हेयर कलर

बालों की सफेदी छिपानी हो या खुद को देना हो एक 'कूल' मेकओवर, हेयर कलर बड़ों से लेकर युवाओं तक के लिए लाइफस्टाइल स्टेटमेंट बन गया है। ग्रूमिंग के लिए किए गए अलग-अलग रंग के हेयर कलर्स दिखने में तो बेहद अच्छे लगते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं इनका आपके बालों पर क्या असर पड़ता है? बाजार में मिलने वाले हेयर कलर्स जिस चमक और गहराई का वादा करते हैं, उसके पीछे रसायनों का एक जटिल विज्ञान काम कर रहा होता है। इस 'इंस्टेंट मेकओवर' की असल कीमत हमारे बालों की सेहत को चुकानी पड़ती है। शारदाकेयर-हेल्थसिटी के डर्मेटोलॉजिस्ट डॉ. शितिज गोयल कहते हैं कि बालों को नियमित रूप से कलर करना सिर्फ एक आदत तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध आपके बालों और स्कैल्प के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। जब आप केमिकल युक्त हेयर डाई का इस्तेमाल बार-बार करते हैं, तो इसका असर सिर्फ रंग पर नहीं, बल्कि बालों की बनावट, मजबूती और स्कैल्प पर भी गहराई से पड़ता है।

हेयर कलर करने के नुकसान और बचाव के उपाय

  1. केमिकल का असर

हेयर डाई में आमतौर पर अमोनिया, हाइड्रोजन पेरोक्साइड और पीपीडी जैसे रसायन मौजूद होते हैं, जो रंग को बालों के भीतर प्रवेश करने में मदद करते हैं। ये रसायन बालों की क्यूटिकल को जबरदस्ती खोलकर उनका नेचुरल रंग हटाने में मदद करते हैं। हालांकि यह प्रकिया बालों की आंतरिक प्रोटीन संरचना को कमजोर करके प्राकृतिक नमी और वसा को नष्ट कर देती है। परिणामस्वरूप, बाल कमजोर होकर रूखे हो जाते हैं, जो धोने या कंघी करने पर आसानी से टूट सकते हैं।

उपाय- बालों को केमिकल डैमेज से बचाने के लिए आप अमोनिया-फ्री, हर्बल या प्राकृतिक विकल्प चुनें। हर रंग के बीच अंतराल दें ताकि बाल रिकवर कर सकें। खासकर संवेदनशील स्कैल्प वाले लोग पेरोक्साइड-मुक्त विकल्पों पर विचार करें।

2. स्कैल्प पर जलन और संवेदनशीलता

हेयर डाई में मौजूद रसायन जब सीधा स्कैल्प से संपर्क में आते हैं तो खुजली, लालिमा, जलन और कभी-कभी एलर्जी जैसे रैशेज पैदा कर सकते हैं। कुछ लोगों में PPD के कारण डर्मेटाइटिस (त्वचा की सूजन वाली स्थिति )भी हो सकता है, जिसमें दर्द, जलन और सूजन दिखाई देते हैं।

उपाय- हर बार डाई लगाने से पहले पैच टेस्ट जरूर करें। अगर स्कैल्प पहले से संवेदनशील है, तो पेशेवर सैलून में कलर करवाएं। खुद से बालों को कलर करना शुरू ना कर दें। डाई लगाते समय स्कैल्प पर नारियल या आर्गन तेल की एक महीन परत लगाकर बालों को कवर करें।

3. बालों का टूटना और पतलापन

बार-बार हेयर कलर करने से उनमें मौजूद केमिकल बालों के भीतर प्रवेश करके बालों की प्राकृतिक मजबूती और नमी को कम कर देते हैं। जिसकी वजह से बालों की संरचना कमजोर हो जाती है, और बाल भारी नहीं, बल्कि पतले होकर धीरे-धीरे टूटने लगते हैं।

उपाय- डाई के बाद डीप कंडीशनिंग और हीलिंग मास्क का इस्तेमाल करें। हर रिंस के बाद मॉइस्चराइजिंग शैम्पू-कंडीशनर का उपयोग करें। केमिकल-फ्री हेयर ऑयल से मालिश करें ताकि तेल की कमी पूरी हो जाए।

4. टेक्सचर में बदलाव और रूखापन

बार-बार हेयर कलर करने से बालों के क्यूटिकल्स प्रभावित होते हैं। जिससे बाल रुखे, फ्रीजी और अनमैनजेबल हो जाते हैं। नमी की कमी उन्हें डल, बेजान और कमजोर बनाती है।

उपाय- डीप कंडीशनिंग ट्रीटमेंट या हीलिंग मास्क हर 2-3 हफ्ते में लगाएं। इसके अलावा हीट स्टाइलिंग (जैसे स्ट्रेटनर/कर्लर) का प्रयोग कम करें। सलून के बाद क्रीम/सीरम का इस्तेमाल करें।

5. संवेदनशील स्कैल्प और एलर्जी प्रतिक्रियाएं

कुछ लोगों को कलर में मिली केमिकल डाई से एलर्जी, जलन और contact dermatitis जैसी समस्या हो जाती है। खास कर PPD वाले डाई में यह प्रतिक्रिया अधिक होती है।

उपाय- ऐसे में पैच टेस्ट करने के बाद ही बालों पर हेयर कलर का पूरा अप्लिकेशन करें। जरा-सी भी खुजली या रैश दिखे तो तुरंत धो लें। बालों को काला करने के लिए प्राकृतिक या हर्बल डाई जैसे हेना-इंडिगो पर विचार करें।

6. रंग दोबारा लगाने और रिकवरी का समय

डॉ. शितिज कहते हैं, कि बालों को बार-बार रंगना सिर्फ स्टाइल नहीं है, यह बालों और स्कैल्प पर बार-बार केमिकल स्ट्रेस डालने जैसा होता है। अगर आप हर 1-2 महीनों में रंग बदलते हैं, तो बालों को रिकवर होने का समय ही नहीं मिलता। जिसकी वजह से धीरे-धीरे बालों की सेहत को नुकसान होने लगता है। विशेषज्ञों के अनुसार साल में 3-4 बार ही रंग करना सुरक्षित माना जाता है, ताकि बालों और स्कैल्प की सेहत अच्छी बनी रहे।

सलाह- स्टाइल के साथ सेहत भी जरूरी

बालों को कलर करना भले ही आज का फैशन और सेल्फ-एक्सप्रेशन का हिस्सा है, लेकिन इसे सुरक्षित ढंग से और सोच-समझकर अपनाना चाहिए। डॉ. शितिज कहते हैं, 'स्टाइल के साथ हेल्थ को भी संतुलित बनाए रखना ही स्मार्ट निर्णय है। इसके लिए सही उत्पाद, सही अंतराल, पेशेवर देखभाल और हेयर केयर अपनाएं।

Manju Mamgain

लेखक के बारे में

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शॉर्ट बायो
मंजू ममगाईं पिछले 18 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर काम कर रही हैं।


परिचय एवं अनुभव
मंजू ममगाईं वर्तमान में 'लाइव हिन्दुस्तान' (हिन्दुस्तान टाइम्स ग्रुप) में बतौर चीफ कंटेंट प्रोड्यूसर लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिख रही हैं। बीते साढ़े 6 वर्षों से इस महत्वपूर्ण भूमिका में रहते हुए उन्होंने न केवल डिजिटल कंटेंट के बदलते स्वरूप को करीब से देखा है, बल्कि यूजर बिहेवियर और पाठकों की बदलती रुचि को समझते हुए कंटेंट को नई ऊंचाइयों तक भी पहुंचाया है। पत्रकारिता के तीनों मुख्य स्तंभों— टीवी, प्रिंट और डिजिटल में कुल 18 वर्षों का लंबा अनुभव उनकी पेशेवर परिपक्वता का प्रमाण है।

करियर का सफर (प्रिंट की गहराई से डिजिटल की रफ्तार तक)
एचटी डिजिटल से पहले मंजू ने 'आज तक' (इंडिया टुडे ग्रुप), 'अमर उजाला' और 'सहारा समय' जैसे देश के शीर्ष मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। 'आज तक' में लाइफस्टाइल और एस्ट्रोलॉजी सेक्शन को लीड करने का उनका अनुभव आज भी उनकी रिपोर्टिंग में झलकता है। वे केवल खबरें नहीं लिखतीं, बल्कि पाठकों के साथ एक 'कनेक्ट' भी पैदा करती हैं।

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दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी (ऑनर्स) और भारतीय विद्या भवन से मास कम्युनिकेशन करने वाली मंजू, साल 2008 से ही मेडिकल रिसर्च और हेल्थ विषयों पर अपनी लेखनी चला रही हैं। उनकी सबसे बड़ी ताकत जटिल वैज्ञानिक तथ्यों और मेडिकल रिसर्च को 'एक्सपर्ट-वेरिफाइड' मेडिकल एक्सप्लेनर स्टोरीज के रूप में सरल भाषा में प्रस्तुत करना है। स्वास्थ्य से जुड़ी उनकी हर खबर डॉक्टरों द्वारा प्रमाणित होती है, जो डिजिटल युग में विश्वसनीयता की कसौटी पर खरी उतरती है।

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