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कहने को मुझमें भी साहस है,  कई रावणों के आने की आहट...

akash thathera

मुश्किलें कितनीं भी हैं, दरिया उफान पर हो, चढ़ना चट्टान पर हो या छूना आसमान को हो, इंसान सफलता हासिल कर ही लेता है। दुनिया में कोई भी ऐसा काम नहीं है जिसे हम नहीं कर सकते हैं। इसी बात की मिसाल हैं लखनऊ के आकाश ठठेरा। पेशे से मोबिलाइजर आकाश दोनों पैरों से दिव्यांग हैं। मगर उनमें हौंसला इतना है कि हर चुनौती को मात देकर खुद एक काबिल इंसान बनाया। 

आकाश को कविता लिखना बेहद पसंद है और उन्होंने अपनी पसंद को हथियार बना लिया है। अब आकाश कई मेहनती दिव्यांग बच्चों के लिए मिसाल बन गए हैं। आकाश अपनी कविताओं को 'लखनवी आकाश' के नाम से प्रकाशित करवाते हैं। उनकी प्रतिभा और लगन को देखकर 'सौभाग्य फाउंडेशन' ने मोबिलाइजर के पद पर नियुक्त किया है।

पेश है आकाश की लिखी एक कविता -

- साहस

कहने को मुझमें भी साहस है, 
कई रावणों के आने की आहट,,

उसने एक हरण की थी सीता, 
यहाँ निसदिन एक गायब है,,

कोई वानर रूप ना धारण कर फिर आया सीता बचाने को,

ना कोई कृष्णा की लीला फिर बचा पाया असिफ़ा को,,

हुवा देश आज़ाद हमारा है ,
पर कन्याओं का कौन सहारा है,,3

कहीं सूनी कलाई भाई की, 
कहीं बे मौसम बरसात लगी,

जो करते रहे हम ऐसे साहस,
तो और बहनें खोयेंगी,,

अभी एक असिफ़ा एक ट्विंकल है,
फिर ना जाने कितनी माँयें रोयेंगी,,

अब कर साहस तू जीने का,
थोड़ा ज़हर समाज का पीने का,

थोड़ा कहर का मौसम ढाने का,
एक संकेत दो कृष्णा के आने का,,

फिर आकाश पे बदली छाने दो,
सारे संसार को अंधकार में छुप जाने दो,

अपराधी के निकट उसे जाने दो,
उसे न्याय सुदर्शनचक्र चलाने दो,

अन्याय के सिर कट जाने दो,
किसी एक को तो आगे आने दो,

किसी माँ-बाप का सिर ना झुकने दो,
ये साहस दीपक ना बुझने दो।।

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  • Web Title:Akash Thathera Disabled Divyang Hindi Poetry