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पत्नी को साथ रहने को नहीं कर सकते मजबूर, झारखंड हाई कोर्ट ने बताया शादी का मकसद

पत्नी को साथ रहने को नहीं कर सकते मजबूर, झारखंड हाई कोर्ट ने बताया शादी का मकसद

संक्षेप:

झारखंड हाईकोर्ट ने पति द्वारा दायर वैवाहिक अधिकारों की बहाली से जुड़े एक मामले में फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि पत्नी को पति के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, खासकर तब, जब उसने मानसिक और शारीरिक क्रूरता के गंभीर आरोप लगाए हों।

Jan 31, 2026 07:32 am ISTMohammad Azam लाइव हिन्दुस्तान, रांची
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झारखंड हाईकोर्ट ने पति द्वारा दायर वैवाहिक अधिकारों की बहाली से जुड़े एक मामले में फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि पत्नी को पति के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब उसने मानसिक और शारीरिक क्रूरता के गंभीर आरोप लगाए हों। यह फैसला जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस एके राय की खंडपीठ ने सुनाया।

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कोर्ट ने धनबाद फैमिली कोर्ट द्वारा 10 मई, 2024 को पारित आदेश को गलत मानते हुए पलट दिया और पत्नी की अपील स्वीकार कर ली। इस मामले में विवाहिता अपने पति से लंबे समय से अलग रह रही है। फैमिली कोर्ट ने पत्नी को पति के साथ रहने का निर्देश दिया था, जिसे हाईकोर्ट ने असंवैधानिक और तथ्यों के विपरीत बताया। हाईकोर्ट में दायर अपनी याचिका में विवाहिता ने आरोप लगाया कि उसके पति और ससुराल वालों ने दहेज की मांग को लेकर उसके साथ मारपीट और मानसिक क्रूरता की। उसने यह भी कहा कि शादी के समय पति की नौकरी के बारे में गलत जानकारी दी गई थी।

विवाहिता ने कोर्ट को यह भी बताया कि वह 2018 से अलग रह रही है और उसके पति और अन्य लोगों के खिलाफ दहेज प्रताड़ना सहित आपराधिक मामला दर्ज किया गया है। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि फैमिली कोर्ट ने सबूतों का पूरी तरह से मूल्यांकन नहीं किया था और केवल चुनिंदा बयानों के आधार पर आदेश पारित किया था। हाईकोर्ट ने साफ किया कि अगर पत्नी सम्मान और गरिमा के साथ पति के साथ नहीं रह सकती, तो उसे ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली का मकसद शादी को बचाना है, न कि किसी एक पक्ष को क्रूरता सहने के लिए मजबूर करना।

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पत्नी को नौकरी छोड़ने के लिए विवश नहीं कर सकते

झारखंड हाईकोर्ट के जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस एके राय की खंडपीठ ने दांपत्य अधिकारों की बहाली लेकर दाखिल याचिका पर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी को अपनी नौकरी छोड़कर पति के साथ रहने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि नौकरी जारी रखना पति से अलग रहने का एक उचित व वैध कारण हो सकता है। अदालत ने पाकुड़ फैमिली कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इंकार करते हुए प्रार्थी जितेंद्र आजाद की याचिका खारिज कर दी।

प्रार्थी जितेंद्र आजाद ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा नौ के तहत पत्नी मीना गुप्ता के खिलाफ दांपत्य अधिकारों की बहाली के लिए याचिका दाखिल की थी। उनका आरोप था कि पत्नी बिना किसी उचित कारण के उन्हें छोड़कर अलग रह रही है। पत्नी ने अदालत को बताया कि पति और ससुराल वालों ने 10 लाख रुपये दहेज की मांग की थी, ताकि स्कार्पियो वाहन खरीदा जा सके। उस पर सरकारी नौकरी छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा था। पत्नी वर्तमान में पाकुड़ में है और वह सरकारी प्लस टू स्कूल में सहायक शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि आधुनिक समाज में महिला को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर रहने का पूरा अधिकार है। पत्नी का नौकरी जारी रखना अनुचित आचरण नहीं माना जा सकता है।

विवाह एक साझेदारी, दोनों पक्ष में संतुलन जरूरी

दांपत्य अधिकारों की बहाली का अर्थ यह नहीं कि पत्नी को जबरन पति की शर्तों पर जीने के लिए बाध्य किया जाए। विवाह एक साझेदारी है, जिसमें दोनों पक्ष को समझौता और संतुलन बनाना होता है। अदालत ने यह भी कहा कि पति यह साबित करने में असफल रहा कि पत्नी बिना किसी वाजिब कारण के अलग रह रही है। अदालत ने पाकुड़ फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है।

Mohammad Azam

लेखक के बारे में

Mohammad Azam
युवा पत्रकार आजम ने लाइव हिन्दुस्तान के साथ पत्रकारिता की शुरुआत की। 8 राज्यों की पॉलिटिकल, क्राइम और वायरल खबरें कवर करते हैं। इनकी मीडिया की पढ़ाई भारतीय जन संचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली से हुई है। इंटरव्यू, पॉडकास्ट और कहानियां कहने का शौक है। हिंदी, अंग्रेजी साहित्य के साथ उर्दू साहित्य में भी रुचि है। और पढ़ें
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