झारखंड में कब लागू होगा पेसा कानून, डेट बताएं; चीफ जस्टिस ने हेमंत सरकार से मांगा जवाब

Mohammad Azam लाइव हिन्दुस्तान, रांची
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झारखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने गुरुवार को मामले की सुनवाई करते हुए सरकार से कहा कि पेसा नियामवली कितने दिनों में लागू की जाएगी, इसकी तिथि बताएं।

झारखंड में कब लागू होगा पेसा कानून, डेट बताएं; चीफ जस्टिस ने हेमंत सरकार से मांगा जवाब

झारखंड हाईकोर्ट ने सरकार से पेसा कानून लागू करने पर जवाब मांगा है। चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने गुरुवार को मामले की सुनवाई करते हुए सरकार से कहा कि पेसा नियामवली कितने दिनों में लागू की जाएगी, इसकी तिथि बताएं।

अदालत ने सरकार को शपथपत्र के माध्यम से पूरी जानकारी कोर्ट में पेश करने का निर्देश दिया। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से बालू एवं लघु खनिज के आवंटन पर रोक को हटाने का आग्रह किया गया, लेकिन अदालत ने आग्रह खारिज करते हुए रोक बरकार रखा। मामले की अगली सुनवाई 17 दिसंबर को होगी। इस संबंध में आदिवासी बुद्धिजीवी मंच की ओर से हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की गई है। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि पंचायती राज विभाग ने पेसा नियमावली का प्रारूप तैयार कर लिया है। पहले उक्त प्रारूप कैबिनेट को-आर्डिनेशन कमेटी को भेजा गया था। आपत्ति आने पर फिर से संशोधित कर ड्राफ्ट कमेटी को भेजा गया है। वहां से इसे कैबिनेट भेजा जाएगा। कोर्ट ने 29 जुलाई 2024 को जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान राज्य सरकार को दो माह के भीतर पेसा नियमावली अधिसूचित करने का आदेश दिया था। अदालत ने कहा था कि संविधान के 73वें संशोधन और पेसा कानून की भावना के अनुरूप नियमावली तैयार कर लागू की जाए। इसके बाद अब तक नियमावली अधिसूचित नहीं की गई है। प्रार्थियों की ओर से वरीय अधिवक्ता अजीत कुमार और अधिवक्ता तान्या सिंह ने पक्ष रखा।

बता दें कि पंचायत (अनसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 (पेसा कानून) केंद्र सरकार ने 1996 में लागू किया गया था। इसका उद्देश्य अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी समुदायों के अधिकारों और हितों की रक्षा करना है। एकीकृत बिहार से लेकर झारखंड गठन के बाद तक राज्य सरकार ने अब तक इस कानून के तहत नियमावली नहीं बनाई है। झारखंड सरकार ने वर्ष 2019 और 2023 में पेसा नियमावली का ड्राफ्ट तैयार किया था, लेकिन उसे लागू नहीं किया गया। इसके बाद आदिवासी बुद्धिजीवी मंच की ओर से अवमानना याचिका दाखिल की है।

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