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बूढ़ी सास की सेवा करना बहू का कर्तव्य, झारखंड हाई कोर्ट ने क्यों कही ये बात

झारखंड हाई कोर्ट ने पारिवारिक विवाद के एक मामले में फैसला सुनाते हुए कहा,''बूढ़ी सास की सेवा करना बहू का कर्तव्य है। महिला अपने पति उनसे अलग रहने के लिए नहीं कह सकती है।''

बूढ़ी सास की सेवा करना बहू का कर्तव्य, झारखंड हाई कोर्ट ने क्यों कही ये बात
Abhishek Mishraलाइव हिन्दुस्तान,रांचीWed, 24 Jan 2024 12:02 PM
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झारखंड हाई कोर्ट ने एक पारिवारिक मामले में फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि बूढ़ी सास (Mother-in-Law) की सेवा करना बहू का कर्तव्य है। वो अपने पति को मां से अलग रहने के लिए नहीं कह सकती है। रुद्र नारायण राय बनाम पियाली राय चटर्जी केस में अदालत ने पौराणिक ग्रंथों का भी हवाला देते हुए निर्णय सुनाया। 

मामले पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुभाष चंद ने कहा कि पत्नी के लिए अपने पति की मां और नानी की सेवा करना अनिवार्य है और उसे उनसे अलग रहने की जिद नहीं करनी चाहिए। न्यायालय ने इस बाबत संविधान के अनुच्छेद 51ए का हवा देते हुए कहा,"भारत के संविधान में अनुच्छेद 51-ए के तहत, एक नागरिक के मौलिक कर्तव्यों को बताया गया है, यह 'हमारी समग्र संस्कृति की समृद्ध विरासत को महत्व देने और संरक्षित करने' का प्रावधान है। पत्नी द्वारा वृद्ध सास या दादी सास की सेवा करना भारत की संस्कृति है।''

इसलिए, अदालत ने यह माना कि एक महिला को अपने पति पर अपनी मां को छोड़ने के लिए दबाव नहीं डालना चाहिए। अपने फैसले में, न्यायालय ने परिवार में महिलाओं के महत्व पर जोर देने के लिए मनुस्मृति सहित हिंदू धार्मिक ग्रंथों का भी इस्तेमाल किया।

न्यायाधीश ने यजुर्वेद के श्लोक का भी जिक्र किया,''हे महिला, तुम चुनौतियों से हारने के लायक नहीं हो। तुम सबसे शक्तिशाली चुनौती को हरा सकती हो। दुश्मनों और उनकी सेनाओं को हराओ, तुम्हारी वीरता हजार है।" इसके अलावा, अदालत ने मनुस्मृति के श्लोकों का हवाला देते हुए कहा - जहां परिवार की महिलाएं दुखी होती हैं, वह परिवार जल्द ही नष्ट हो जाता है, लेकिन जहां महिलाएं संतुष्ट रहती हैं, वह परिवार हमेशा फलता-फूलता है।

गौरतलब हो, दुमका की एक पारिवारिक अदालत के आदेश को याचिकाकर्ता ने चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी अलग रह रही पत्नी को भरण-पोषण के रूप में ₹30,000 और अपने नाबालिग बेटे को ₹15,000 देने का आदेश दिया गया था। महिला ने आरोप लगाया था कि उसके पति और ससुराल वालों ने उसके साथ क्रूरता की और दहेज के लिए उसे प्रताड़ित किया जा रहा था। जबकि पति का आरोप है कि पत्नी उस पर मां और दादी से अलग रहने का दबाव डालती थी। उसने बताया कि पत्नी अक्सर घर की दो बूढ़ी महिलाओं से झगड़ा करती थी और उसे बताए बिना अपने मायके जाती रहती थी।

हाई कोर्ट ने दुमका न्यायालय का फैसला पलटते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से संकेत मिलता है कि पत्नी बिना किसी कारण के पति पर उसकी मां और दादी से अलग रहने के लिए दबाव डाल रही थी। 

न्यायमूर्ति चंद ने प्रोफेसर टेरेसा चाको द्वारा लिखित 'पारिवारिक जीवन शिक्षा का परिचय' नामक पुस्तक का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि पति-पत्नी के बीच मामला यह था कि पत्नी वृद्ध सास और दादी सास की सेवा नहीं करना चाहती है। पीठ ने कहा,"वह अपने पति पर अपनी मां और दादी से अलग रहने के लिए दबाव बनाती है। बिना किसी वजह के पत्नी अलग रहना चाहती है तो गुजरा भत्ता देने से इनकार किया जा सकता है।" अदालत ने सीआरपीसी सेक्शन 125(4) का हवाला देते हुए आदेश दिया। 

अदालत ने ने पारिवारिक अदालत के आदेश को उस हद तक रद्द कर दिया, जिसमें पत्नी को 30,000 रुपये गुजारा भत्ता देने की अनुमति दी गई थी। हाईकोर्ट ने बेटे का गुजारा भत्ता 15,000 से बढ़ाकर ₹25,000 कर दिया। पति की ओर से अधिवक्ता इंद्रजीत सिन्हा और अखौरी अविनाश कुमार उपस्थित हुए। पत्नी का प्रतिनिधित्व अधिवक्ता राहुल कुमार ने किया।

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