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कुर्मी को एसटी सूची में शामिल करने के लिए फिर से होगा शोध, सरकार ने टीआरआई को सौंपी जिम्मेदारी

Raghuvar Das

झारखंड के कुर्मी-कुड़मी, महतो जाति को अनुसूचित जनजाति सूची में पुन: शामिल करने के लिए सरकारी स्तर पर कार्य शुरू हो गया है। झारखंड सरकार दोबारा शोध कराने जा रही है कि कुर्मी जाति अनुसूचित जनजाति के समतुल्य है या नहीं। यह शोध डॉ राम दयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान (टीआरआई) करेगा। शोध के बाद आगे की कार्रवाई होगी। शोध टॉटेम-गोत्र व अन्य पहलुओं पर होगा। कुर्मी-महतो को एसटी का दर्जा देने की मांग लम्बे समय से चल रही है। इसके लिए पक्ष-विपक्ष के विधायकों ने मुख्यमंत्री को पत्र भी भेजा है। इसके कारण आदिवासी संगठनों में उबाल है। 

भाषाई जनगणना के अनुसार 18 लाख की आबादी
1991 के भाषाई संर्वेक्षण के अनुसार झारखंड में संथाली भाषा सबसे ज्यादा बोली जाती है। 21 लाख संथाली समुदाय के लोग हैं। कुरमाली बोलनेवालों की संख्या 18 लाख है। कुर्मी समुदाय के लोग रांची, हजारीबाग, धनबाद, गिरीडीह, सरायकेला-खरसांवा, साहेबगंज, गोड्डा जिलों में मिलते हैं।  संविधान (अनुसूचित जनजातियों आदेश 1950) की सूची में कुर्मी-कुड़मी जाति को जनजाति समुदाय में से हटा दिया गया था और पिछड़ा वर्ग-1 में शामिल कर दिया गया।  1979 से कुर्मी को  पुन: आदिवासी सूची में शामिल करने की मांग की जा रही है।

शामिल करने के तर्क 
झारखंड कुर्मी संघर्ष मोर्चा ने मुख्यमंत्री को सौंपे ज्ञापन में कहा है  कि एचएच रिसले की एथनोग्राफिक रिसर्च रिपोर्ट में  छोटानागपुर और ओड़िसा की कुर्मी-महतो जाति को जनजाति माना गया है। 1891-92 में द ट्राइब एंड कास्ट ऑफ बंगाल में इसे आदिम जनजाति की मान्यता प्रदान की गई थी। झारखंड के कुर्मी-महतो गणचिन्ह टॉटेमवादी है व  इनकी भाषा, संस्कृति, सभ्यता और  सामाजिक आधार बिहार, यूपी के कुरमी से भिन्न है। कुर्मी में लगभग सौ गोत्र हैं।

दो बार टीआरआई दे चुकी है रिपोर्ट
 झारखंड जनजातीय कल्याण शोध संस्थान के द्वारा वर्ष 2004 में सहायक निदेशक सोमा सिंह मुंडा की रिपोर्ट जारी हुई। इसमें कहा गया कि कुर्मियों का गोत्र चिन्ह मुख्य रूप से 20 है। ये गोत्र आर्य लोगों की तरह ऋषि-मुनियों से संबंधित है। इनके धर्मगुरु ब्राह्मण हैं और ये हिंदू देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। ये आदिवासियों की तरह संकोची नहीं होते बल्कि बाहरी लोगों के संपर्क में रहते हैं। वर्ष 2008 में आई संस्थान के निदेशक डॉ प्रकाश चंद्र उरांव की रिपोर्ट में कहा गया कि कुर्मी जाति को न तो अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में और न ही अनुसूचित जाति में रखा जा सकता है। 

डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान के निदेशक रणेंद्र कुमार के अनुसार, कुर्मी समुदाय को लेकर दोबारा शोध होगा। अभी इस संबंध में कुछ नहीं कहा जा सकता है। 

झारखंड कुर्मी संघर्ष मोर्चा के संयोजक मंडली सदस्य डॉ राजा राम महतो के मुताबिक, कुर्मी में सौ गोत्र हैं। इनका रहन-सहन व खानपान जनजातीय समुदाय से मिलता-जुलता है। सीएम को दस्तावेज दे दिए गए हैं। उम्मीद है कि हमें एसटी का दर्जा मिलेगा।

आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के अध्यक्ष  पीसी मुर्मू कहते हैं कि टीआरआई की दो रिपोर्ट में स्पष्ट है कि जनजाति समुदाय से कुर्मी ताल्लुक नहीं रखते हैं। इनकी संस्कृति व परंपरा आदिवासियों से मेल नहीं खातीं। ये हिंदू परंपरा का निर्वहन करते हैं। 

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  • Web Title:Kurmi to be included in the ST list again the government has entrusted responsibility to the TRI