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झारखंडJharkhand success story : जिन्होंने लॉकडाउन की बंदिशों को अवसर में बदला, जरूर पढ़ें और प्ररेणा लें

रांची, रामगढ़, साहिबगंज, हजारीबाग हिटीPublished By: Rupesh
Wed, 03 Jun 2020 05:41 PM
पतरातू के इंजीनियर धीरेंद्र ने लॉकडाउन के दौरान खेती कर कमाई का नया जरिया ढूंढ़ निकाला।
1 / 4पतरातू के इंजीनियर धीरेंद्र ने लॉकडाउन के दौरान खेती कर कमाई का नया जरिया ढूंढ़ निकाला।
लॉकडाउन के दौरान अपने घर में लाह का प्रोडक्ट बनाता झाबर मल।
2 / 4लॉकडाउन के दौरान अपने घर में लाह का प्रोडक्ट बनाता झाबर मल।
कोरोना आपदा से पैदा हुए लॉकडाउन के बीच कलाकृति बनाने साहिबगंज के चित्रकार श्याम विश्वकर्मा।
3 / 4कोरोना आपदा से पैदा हुए लॉकडाउन के बीच कलाकृति बनाने साहिबगंज के चित्रकार श्याम विश्वकर्मा।
आदित्य जायसवाल, दीपक कुमार गुप्ता और सलमान अहमद, जो धंधा बंद होते ही दवा की होम डिलीवरी कर रहे।
4 / 4आदित्य जायसवाल, दीपक कुमार गुप्ता और सलमान अहमद, जो धंधा बंद होते ही दवा की होम डिलीवरी कर रहे।

लॉकडाउन भले ही आवाम के लिए मुसीबतों का पहाड़ लेकर आया है, लेकिन कई लोगों के लिए यह जीने के नए तजुर्बे और अवसर भी लाया है। कुछ अपनी पुरानी कला को निखार देने में जुटे हैं तो कुछ नए कौशल सीख कर बेहतरी के लिए आजमाने का माद्दा लिए फिर से उठ खड़े हुए हैं। रोजगार से कारोबार तक और शिक्षा से लेकर नौकरी तक लॉकडॉउन के दौरान मिले ऐसे तमाम नए सौगातों की लंबी फेहरिस्त है।

रांची में चूड़ी बनाते थे, लाह से 50 आइटम बनाने लगे : कांटाटोली निवासी लाह कारीगर झाबर मल ने लॉकडाउन में सोशल मीडिया की मदद से लाह से अलग-अलग डिजाइन बनाना सीखा। पत्नी, बेटी, बेटा और परिजनों को भी सिखाकर इस कारोबार से जोड़ा। लॉकडाउन से पहले वह मात्र लाह की चूड़ी और कंगन बनाकर बेचते थे, लेकिन आज वे 50 से ज्यादा लाह के अलग-अलग प्रोडक्ट बना रहे हैं। झाबर के पिता भी लाह के कारीगर थे। झारक्राफ्ट के माध्यम से भी झाबर इसकी ऑनलाइन बिक्री करते हैं। इस समय बिक्री तो नहीं है, लेकिन लॉकडाउन में पूरा परिवार घर में है, ऐसे में नामकुम स्थित लाह संस्थान से लाह खरीदकर पूरा परिवार अलग-अलग प्रोडक्ट बनाने में जुटा है। झाबर ने बताया कि वह आसपास की  भी कुछ महिलाओं को इससे जोड़ते हुए रोजगार देने की तैयारी में है। झाबर लाह से चाबी रिंग, शृंगार बॉक्स, लंच बॉक्स, गिलास और मग के ऊपर लाह का लेप कर आकर्षक डिजाइन, सिगरेट रखने वाला ट्रे, डिनर सेट, आर्टिफिशियल ज्वेलरी, ज्वेलरी बॉक्स, फ्लावर पॉट, दुल्हन सेट पॉट, प्लेन बाला, डिजाइन बाला, कलम, लाह बटन समेत अन्य प्रोडक्ट बना रहे हैं। 

रामगढ़ में इंजीनियर ने खेती से बढ़ाई आमदनी : पतरातू के इंजीनियर धीरेंद्र का काम लॉकडाउन में पूरी तरह से बंद हो गया। उनके साथ आए कामगार वापस अपने घर लौट गए। अब धीरेंद्र के पास बीच-बीच में अपने साइट देखने का काम रह गया था। ऐसे में उन्होंने खेती करने का निर्णय लिया। इसके लिए पहले उन्हें जमीन की जरूरत थी, दूसरा खेती के तरीके सीखने की। बासल थाना क्षेत्र के भंडरा गांव में वे जिस किराए के मकान में रहते थे, उसके मकान मालिक की झाड़ियों से पटी खाली पड़ी करीब चार कट्ठा जमीन खेती के लिए ले ली। कौन सी खेती करनी चाहिए, कैसे और कब कौन से बीज लगाया जाए, इसके लिए उन्होंने गूगल और यू-ट्यूब खंगाले। उनके सारे सवालों का जवाब उन्हें मिल गया। इसके बाद हाथ में कुदाल और टांगी लेकर वे खुद खेत में उतरे। पहले जमीन की झाड़ियों को साफ किया। उसके बाद एक मजदूर को साथ लेकर जमीन की कोड़ाई शुरू की और बीज लगाकर उसकी सिंचाई शुरू कर दी। जमीन के छोटे से टुकड़े पर शुरू की गई उनकी खेती में मूली, पालक, लाल साग, धनिया तो चंद दिनों में उन्हें अपनी उपज देने लगे, वहीं करेला, भिंडी, नेनुआ, लॉकी, खीरा, दो प्रकार की बोदी, मकई, टमाटर और कोहड़ा भी अब फल देने के लिए तैयार हो गए हैं। धीरेंद्र कहते हैं कि इस बार की खेती ने उन्हें समझा दिया कि फूल टाइम और पार्ट टाइम खेती कर आत्मनिर्भर बना जा सकता है।

साहिबगंज में कलाकार श्याम ने टेराकोटा में भी हाथ आजमाए, पाई प्रसिद्धि : साहिबगंज के 46 वर्षीय चित्रकार श्याम विश्वकर्मा ने कोरोना आपदा से पैदा हुए लॉकडाउन की स्थिति को अवसर में बदला है। पटना आट्र्स कॉलेज से स्नातक श्याम यूं तो अपने म्यूरल पेंटिंग के लिए मशहूर हैं, लेकिन इन दिनों वे विशेष प्रकार की मिट्टी से टेराकोटा के डिजायनर पॉट तैयार करने में जुटे  हुए हैं। यह पहला मौका है, जब वे इस कला में अपने हाथ आजमा रहे हैं। इससे पहले वे म्यूरल पेंटिंग जो कि ठोस सतह जैसी दीवार, दरवाजे पर सीधे उकेरी जाती है। उसके लिए जाने जाते रहे हैं। श्याम बताते हैं कि उन्होंने लॉकडाउन के चलते इन दिनों खाली समय में घर की सजावट के लिए टेराकोटा के पॉट बनाने के बारे में सोचा। इसे बनाकर सोशल मीडिया पर डाला। देखते ही देखते तस्वीरें वायरल होने लगीं। लॉकडाउन में इसका फायदा मिलने लगा। इन सामान की राज्य में डिमांड भी बढ़ गई है। वे बताते हैं कि लॉकडाउन में अपनी कलाकृतियां बेचकर वे गरीब और जरूरतमंदों की मदद भी कर रहे हैं। खाली समय में वे स्कूलों की आर्थिक दृष्टि से कमजोर बच्चों को ऑनलाइन पेंटिंग सिखाने का काम भी कर रहे हैं। इससे अबतक कई बच्चे नए अंदाज में शानदार पेंटिंग बनाने लगे हैं। श्याम के अनुसार बच्चों की प्रतिभा देख उन्हें काफी खुशी मिल रही है।  श्याम विश्वकर्मा को उनकी उत्कृष्ट कलाकृति के लिए कई पुरस्कार भी मिल चुके हैं। इनमें राजीव गांधी ओपन टैलेंट नेशनल अवार्ड (दिल्ली), कला संस्कृति, युवा कार्य विभाग की ओर से टेराकोटा में स्टेट अवार्ड, उद्योग विभाग हस्तकरघा वस्त्र मंत्रालय (झारखंड सरकार) के द्वारा राज्यस्तरीय सम्मान, जेसीए सम्मान रांची, सरस पुरस्कार (नई दिल्ली), विश्वविद्यालय कला पुरस्कार (पटना), साहिबगंज गौरव सम्मान प्रमुख है। अपनी कलाकृति में श्याम झारखंड के आदिवासी लोक संस्कृति और सोहराय पेंटिंग समेत स्थानीय कला पर खासतौर से फोकस हैं। उन्होंने बताया कि जल्द ही वे अपनी कलाकृति की ऑनलाइन मार्केटिंग भी शुरू करने जा रहे हैं। इसकी तैयारी चल रही है। 

हजारीबाग में धंधा बंद होते ही तीन मित्र मिलकर दवा की होम डिलीवरी करने लगे : लॉकडाउन में धंधा बंद होते ही तीन मित्र मिलकर दवा और कोरोना सेफ्टी किट की होम डिलीवरी  करने लगे। देखते ही देखते उनका यह प्रयास कारगर होने लगा और इस समय वे शहर ही नहीं, आसपास के क्षेत्रों में भी होम डिलीवरी कर रहे हैं। उन्होंने लॉकडाउन की बंदिशों को अवसरों में बदला। पंचमंदिर चौक पर टूर एंड ट्रेवल्स कंपनी चलाने वाले दीपक गुप्ता समेत इनके दो मित्र सलमान अहमद और आदित्य जायसवाल ने अपने स्टार्ट-अप का नाम ऑनलाइन हेल्थ केयर एट योर डोर स्टेप दिया है। दीपक के अनुसार, टूर एंड ट्रैवल का काम लॉकडाउन में ठप हो गया। उनके आठ कर्मचारी भी बेरोजगार हो गए। ऐसे में ऑनलाइन दवा उपलब्ध करवाने का आइडिया दिमाग में आया। दीपक बताते हैं कि इसमें फार्मासिस्ट का लाइसेंस होना जरूरी था, ऐसे में उनके साथी सलमान अहमद का उन्हें साथ मिला। उनके एक अन्य दोस्त आदित्य फाइजर कंपनी में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव रहे हैं, इसलिए उन्हें भी अपने साथ ले लिया। सोशल साइट, डिजिटल मीडिया, व्हाट्सएप, मैसेंजर, इमेल टेलीफोनिक किसी माध्यम से ऑर्डर लिया जाता है। 

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