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स्वदेशी तकनीक से मछली पालन कर चार लाख तक कमा रहे किसान, कैसे बदला जीवन?

झारखंड में कई किसान स्वदेशी तकनीक से मछली पालन कर चार लाख रुपए तक सालाना कमा रहे हैं। कहानी हरी महतो की जिन्होंने खेतीबाड़ी छोड़ मछली पालन में हाथ आजमाया और खूब कमाई कर रहे हैं। पढ़ें यह रिपोर्ट...

स्वदेशी तकनीक से मछली पालन कर चार लाख तक कमा रहे किसान, कैसे बदला जीवन?
Krishna Singhहिंदुस्तान,रामगढ़Tue, 21 Nov 2023 06:43 PM
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रामगढ़ के कई किसान स्वदेशी तकनीक से मछली पालन कर चार लाख रुपए तक सालाना कमा रहे हैं। इन्हीं किसानों में से एक हैं हरी महतो। समाहरणालय के नजदीक रहने वाले हरी महतो साल 2021-22 से पूर्व खेतीबाड़ी कर अपनी जीविका को जैसे-तैसे चला रहे थे। प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना से बनाए गए 25 टैंक के बायोफ्लोक से इनका जीवन बदल गया।  

4 लाख रुपए तक की आमदनी
हरी महतो बताते हैं कि साल 2021-22 में बायोफ्लोक में पंगास, गिफ्ट, तिलापिया और सिंघी की अलग-अलग प्रजातियों की लगभग 6.5 टन से 7 टन मछली उत्पादन कर बाजार में 7.80 लाख से 8.40 लाख रुपए की बिक्री कर चुके हैं। इसमें शुद्ध आय 3.50 लाख से 4 लाख रुपए तक हुई। मौजूदा वक्त वह आठ से नौ टन पंगस, ग्रास कार्प और कॉमन कार्प प्रजातियों की मछलियों का उत्पादन कर रहे हैं। 

सब्जी उत्पादन में भी हुई वृद्धि  
हरी महतो बताते हैं कि बायोफ्लोक में मछली पालन के लिए उपयोग किए गए पानी का उपयोग वे फसल उगाने में कर रहे हैं जिससे फसल की पैदावार और गुणवत्ता में दोगुना वृद्धि हो गई है। हरी महतो से प्रेरणा लेकर आज सैकड़ों नवयुवक मत्स्य पालन में रोजगार कर रहे हैं। इन्होंने अपनी मेहनत से ये बता दिया है कि अगर कुछ करने की चाह हो तो मंजिल दूर नहीं है। 

मत्स्य विभाग भी दे रहा सहयोग  
खेती करने वाले किसानों ने जब मछली पालन का मन बनाया तो उन्हें जिला मत्स्य विभाग ने भी पूरा सहयोग दिया। विभाग के अधिकारी उन्हें प्रशिक्षण देने के साथ ही मछली का बीज भी समय-समय पर उपलब्ध कराते रहे जिससे मछली पालन का इनका अभियान भी सफल रहा। आज उन्हें अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने में मछली पालन से बहुत मदद मिल रही है। 

क्या है बायोफ्लोक तकनीक?
बायोफ्लोक एक ऐसी तकनीक है, जो बैक्टीरिया के कारण टैंक को गंदा नहीं होने देती है। इसकी वजह से मछलियां बीमारियों से बची रहती हैं। इसके अलावा रोज टैंक में पानी बदलने की भी जरूरत नहीं होती है। बता दें कि मछलियों के लिए रोजाना पानी बदलना बहुत ही मुश्किल काम होता है। इस तकनीक के आने से किसानों को रोज पानी बदलने की परेशानी से भी छुटकारा मिल गया है। 

किसानों को जोड़ रही सरकार
इसके अलावा इस तकनीक के आ जाने के बाद किसानों को मछलियों के लिए प्रोटीन पर भी अब खर्च नहीं करना पड़ता है। जिला मत्स्य पदाधिकारी प्रदीप कुमार के अनुसार जिले में ऐसे कई किसानों को सरकार की महत्वाकांक्षी योजना से जोड़ा जा रहा है। इतना ही नहीं इस तरह की योजनाओं को देख आज की युवा पीढ़ी भी जुड़ कर अपनी आय को बढ़ा रही है।