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हिंदी न्यूज़ झारखंडकोरोना से जंग: झारखंड को अबतक नहीं मिली जीनोम सिक्वेंसिंग मशीन, उड़ीसा भेजे जाते हैं सैम्पल, वेरिएंट का पता लगाने में लगता है एक माह

कोरोना से जंग: झारखंड को अबतक नहीं मिली जीनोम सिक्वेंसिंग मशीन, उड़ीसा भेजे जाते हैं सैम्पल, वेरिएंट का पता लगाने में लगता है एक माह

संवाददाता,रांचीSudhir Kumar
Mon, 29 Nov 2021 07:00 AM
कोरोना से जंग: झारखंड को अबतक नहीं मिली जीनोम सिक्वेंसिंग मशीन, उड़ीसा भेजे जाते हैं सैम्पल, वेरिएंट का पता लगाने में लगता है एक माह

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कोरोना के नए वेरिएंट ओमिक्रोम दक्षिण अफ्रीका समेत कई देशों में मिले हैं। कोरोना वायरस अब तक कई वेरिएंट बदल चुका है। वेरिएंट के बदलाव का पता सैंपल जीनोम सिक्वेंसिंग मशीन से लगाया जा सकता है। यह मशीन कोरोना की दो लहर बीत जाने के बाद भी अब तक राज्य सरकार खरीद नहीं पाई है। कई बार सरकार ने खरीदारी के लिए योजना भी तैयार की पर जीनोम सिक्वेंसिंग मशीन राज्य को नहीं मिल सकी।

 08 माह पहले ही जीनोम सिक्वेंसिंग मशीन की खरीदारी के लिए प्रस्ताव को स्वीकृत कराया गया था

राज्य सरकार ने दो मशीनों की खरीदारी की बात कही थी, एक मशीन को रिम्स और दूसरी को एमजीएम जमशेदपुर में स्थापित करने की बात कही थी। इसके अलावा रिम्स ने अपने जीबी से करीब आठ माह पहले ही जीनोम सिक्वेंसिंग मशीन की खरीदारी के लिए प्रस्ताव को स्वीकृत करा लिया था, बावजूद अब तक रिम्स मशीन नहीं खरीद सका है। बता दें कि राज्य में वेरिएंट की जांच के लिए सैंपल आईएसएल भुवनेश्वर भेजे जाते हैं। जिस कारण सैंपल से वेरिएंट का पता लगने में एक महीने से अधिक लग जाते हैं। राज्य के पास जीनोम सीक्वेंसिंग मशीन होने से एक सप्ताह के अंदर वेरिएंट का पता लगाया जा सकता था।

नहीं उठा कारगर कदम

● विभाग ने दो जीनोम सिक्वेंसिंग मशीन की खरीद के लिए दिया था प्रस्ताव

● स्वास्थ्य मंत्री ने भी दो मशीनों के खरीदारी की कही थी, इस दिशा में कारगर कदम नहीं उठा

● रांची के रिम्स और एमजीएम जमशेदपुर में मशीनों को स्थापित करने की कही गई थी

वेरिएंट का जल्द पता चल जाने से प्रसार को रोका जा सकता है 

रिम्स या राज्य के किसी भी संस्थान में जीनोम सिक्वेंसिंग होने से जल्द ही वायरस के नए वेरिएंट का पता लग जाएगा। इससे यह हो सकता है कि किसी संबंधित क्षेत्र में अगर कोरोना के अधिक मरीज मिल रहे हैं तो उनके सैंपल का जांच कर तुरंत वेरिएंट का पता लग जाएगा। साथ ही उस संबंधित इलाके को कंटेनमेंट जोन बनाकर प्रसार को रोका जा सकता है। वहीं राज्य के पास अपना सिक्वेंसिंग मशीन होने से सैंपल के जांच के लिए संख्या की बाध्यता नहीं होगी। कम समय में विभिन्न इलाकों के सैंपल का पता लगाया जा सकेगा। इससे आसानी से यह पता चल सकेगा कि किस इलाके में कौन-सा वेरिएंट मिल रहा है। वहीं सिक्वेंसिंग मशीन नहीं होने से वेरिएंट का पता जबतक लगता है उतने में प्रसार हो चुका होता है।

रैंडम नमूनों की होती है सिक्वेंसिंग

कोरोना वायरस का नया स्ट्रेन कितना संक्रामक या घातक होगा, इसकी जानकारी भी सिक्वेंसिंग के जरिए हो सकेगी। जांच होने के बाद सरकार तेजी से एहतियाती उपाय कर लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकेगी। इनकी रिपोर्ट के आधार पर सरकार कोरोना संक्रमण से निपटने की बेहतर रणनीति भी बना सकेगी।

 


 

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