सरायकेला छऊ: परंपरा और इवेंट के बीच संघर्ष, राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव ने जताई चिंता

Mar 14, 2026 01:27 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, सराईकेला
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सरायकेला की छऊ नृत्य अपनी मौलिकता की लड़ाई लड़ रहा है। राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव ने प्रशासन की अनदेखी पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि चैत्र पर्व केवल एक महोत्सव नहीं, बल्कि छऊ की आत्मा है। अगर प्रशासन नृत्य का प्रदर्शन करना चाहता है, तो उसे 29 अप्रैल का दिन चुनना चाहिए।

सरायकेला छऊ: परंपरा और इवेंट के बीच संघर्ष, राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव ने जताई चिंता

सरायकेला। सरायकेला की मिट्टी की पहचान और विश्व प्रसिद्ध सांस्कृतिक धरोहर 'छऊ नृत्य' आज अपने अस्तित्व और मौलिकता की लड़ाई लड़ रहा है। सरायकेला राजपरिवार के सदस्य राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव ने छऊ के गिरते स्तर और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। एक प्रेस वार्ता मे उन्होंने स्पष्ट किया कि 13 अप्रैल को मनाया जाने वाला 'चैत्र पर्व' केवल एक महोत्सव नहीं, बल्कि सरायकेला छऊ की आत्मा और सदियों पुरानी परंपरा है, जिसे प्रशासन की अनदेखी ने महज एक 'इवेंट' तक सीमित कर दिया है। परंपरा बनाम इवेंट की राजनीतिराजा प्रताप आदित्य सिंहदेव का कहना है कि प्रशासन चैत्र पर्व की धार्मिक और पारंपरिक महत्ता को समझने में विफल रहा है।

उन्होंने तर्क दिया कि यदि प्रशासन को नृत्य का प्रदर्शन ही करना है, तो इसके लिए 29 अप्रैल (अंतरराष्ट्रीय नृत्य दिवस) का दिन सबसे उपयुक्त है। छऊ को परंपराओं के खिलाफ जाकर मात्र 13 अप्रैल को एक सरकारी समारोह का रूप देना हमारी 'माटी' की संस्कृति का अपमान है। उनके अनुसार, "छऊ हमारी सांकृतिक धरोहर है और इसे बचाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है, न कि इसे बाजारवाद का हिस्सा बनाना।चैत्र पर्व और छऊ का ऐतिहासिक जुड़ावसरायकेला छऊ का इतिहास 300 वर्षों से भी अधिक पुराना है। इसका उद्भव मार्शल आर्ट के अभ्यास 'परिखंडा' (पारी यानी ढाल और खंडा यानी तलवार) से हुआ है। पारंपरिक रूप से, यह नृत्य भगवान शिव और शक्ति की उपासना से जुड़ा है। चैत्र पर्व के दौरान 13 दिनों तक कठिन तपस्या और अनुष्ठान होते हैं, जिसमें 'कलश स्थापना' और 'जातरा घट' का विशेष महत्व है। इस कला को सरायकेला राजपरिवार ने न केवल संरक्षण दिया, बल्कि स्वयं राजकुमारों ने इसमें निपुणता हासिल की। राजा विजय प्रताप सिंहदेव ने 1930 के दशक में इसे यूरोपीय मंचों तक पहुँचाया था। सरायकेला शैली की सबसे बड़ी विशेषता इसके काव्यात्मक मुखौटे हैं, जो पात्रों के सूक्ष्म भावों को जीवंत करते हैं।संरक्षण की पुकारवर्ष 2010 में यूनेस्को ने छऊ को 'अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' का दर्जा दिया था, लेकिन स्थानीय स्तर पर यह सरकारी फाइलों और तीन दिवसीय 'छऊ महोत्सव' तक सिमटता जा रहा है। राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव ने चेताया कि यदि छऊ के मूल स्वरूप और इससे जुड़ी पारंपरिक तिथियों का सम्मान नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इसे केवल एक मनोरंजन के साधन के रूप में देखेंगी, न कि अपनी पहचान के रूप में। प्रशासन को चाहिए कि वह कलाकारों की सुध ले और चैत्र पर्व के अनुष्ठानों को महोत्सव के शोर-शराबे से अलग रखते हुए इसकी पवित्रता बनाए रखे

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