
कृष्ण धरोहर का होगा दस्तावेजीकरण, लिखी जाएगी जगन्नाथ से विट्ठल तक हजारों मंदिरों की विरासत
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने गुरुवार को भोपाल स्थित भारत भवन में ‘श्रीकृष्ण पाथेय’ पत्रिका का विमोचन किया। इसमें कृष्ण धरोहर का दस्तावेजी करण किया जाएगा और हजारों मंदिरों का भी दस्तावेजीकरण किया जाएगा।
जब भारतीय संस्कृति के डिजिटल दस्तावेजीकरण की बात आती है तो एक विरोधाभास सामने आता है। विजडमलिब जैसी वेबसाइट, जिसमें सनातन संस्कृति से जुड़ी हजारों पुस्तकें और तीन लाख से अधिक परिभाषाएं हैं लेकिन य एक पश्चिमी व्यक्ति द्वारा संचालित है। ऐसे में भारतीय संगठनों द्वारा अपनी विरासत के दस्तावेजीकरण की पहल महत्वपूर्ण हो जाती है। इसी क्रम में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने गुरुवार को भोपाल स्थित भारत भवन में ‘श्रीकृष्ण पाथेय’ पत्रिका का विमोचन किया।
यह पत्रिका मध्य प्रदेश सरकार द्वारा गठित श्रीकृष्ण पाथेय न्यास द्वारा प्रकाशित की जा रही है। पत्रिका के संपादक श्रीराम तिवारी हैं जबकि सह-संपादक और संयोजक देवऋषि हैं। न्यास ने भगवान कृष्ण से जुड़े स्थलों के संरक्षण और दस्तावेजीकरण के लिए सनातन विजडम के साथ मिलकर काम करने का निर्णय लिया है।
सनातन विजडम मथुरा से द्वारका तक श्रीकृष्ण से जुड़े स्थलों का शोध-आधारित मानचित्रण कर रही है। परियोजना में लिखित ग्रंथ, पुरातात्विक साक्ष्य और मौखिक परंपराओं को अलग-अलग श्रेणी में रखा जा रहा है। मथुरा, गोकुल, नंदगांव, वृंदावन, उज्जैन, जानापाव, तटीय क्षेत्र और द्वारका तक के मार्ग के साथ-साथ असम में नरकासुर प्रसंग से जुड़े स्थलों को भी शामिल किया जा रहा है। राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के गांवों में स्थानीय लोककथाओं का भी दस्तावेजीकरण हो रहा है।
उज्जैन में शोध कार्य अगस्त में पूर्ण हुआ जिसमें पद्मश्री डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित, डॉ. बाल कृष्ण शर्मा और डॉ. आर.सी. ठाकुर जैसे विद्वानों से परामर्श लिया गया। मथुरा-वृंदावन में शोध जारी है। परियोजना उन शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और पुरातत्वविदों का डेटा संग्रह भी तैयार कर रही है जिन्होंने कृष्ण अध्ययन पर काम किया है।
दिलचस्प बात यह है कि सनातन विजडम अब श्रीकृष्ण के अन्य रूपों पर डेटा संकलन का काम भी शुरू कर रही है। जगन्नाथ स्वामी, विट्ठल सहित कृष्ण की विभिन्न क्षेत्रीय परंपराओं पर शोध किया जा रहा है जिसे अगले प्रकाशनों में शामिल किया जाएगा। यह विस्तार इस बात का संकेत है कि परियोजना केवल एक भौगोलिक मार्ग तक सीमित नहीं रहना चाहती बल्कि कृष्ण की संपूर्ण सांस्कृतिक उपस्थिति को दस्तावेजीकृत करना चाहती है।
संस्था के सह-संस्थापक साधना पांडेय और देवऋषि हैं जबकि व्योमकेश कार्यकारी निर्देशक हैं। योजना है कि शोध सामग्री को बहुभाषी डिजिटल मंच, इंटरैक्टिव मानचित्र और 108-एपिसोड वृत्तचित्र श्रृंखला के माध्यम से प्रस्तुत किया जाए। देवऋषि का उपन्यास “द कृष्ण इफेक्ट” भी इस परियोजना का हिस्सा है जो मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से कृष्ण को देखने का प्रयास है।
यह पहल ऐसे समय में हो रही है जब देश में सांस्कृतिक डिजिटलीकरण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सरकार के राष्ट्रीय स्मारक और पुरावशेष अभियान ने 12.34 लाख पुरावशेषों का डिजिटलीकरण किया है। सितंबर 2025 में प्रधानमंत्री ने ‘ज्ञान भारतम’ वेब पोर्टल लॉन्च किया जो भारत की पांडुलिपि विरासत को संरक्षित करने की महत्वाकांक्षी पहल है। नवंबर में अडानी समूह के अध्यक्ष गौतम अडानी ने जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी की उपस्थिति में अहमदाबाद में आयोजित वैश्विक इंडोलॉजी सम्मेलन में ‘भारत नॉलेज ग्राफ’ बनाने के लिए 100 करोड़ रुपये की घोषणा की। यह भारत के सभ्यतागत ज्ञान को डिजिटल माध्यम पर संरक्षित करने के लिए एक ढांचा तैयार करेगा।
लेकिन यह भी सच है कि भारत की विशाल सांस्कृतिक विरासत को देखते हुए इन पहलों का दायरा अभी भी सीमित है। अनगिनत छोटे मंदिर, स्थानीय परंपराएं, क्षेत्रीय ग्रंथ और मौखिक इतिहास अब तक अछूते हैं। कृष्ण की विभिन्न क्षेत्रीय परंपराओं - चाहे वह ओडिशा का जगन्नाथ हो, महाराष्ट्र का विट्ठल हो, या असम की नरकासुर कथाएं हों - इन सबका व्यवस्थित दस्तावेजीकरण एक बड़ी आवश्यकता है।
कई राज्यों में फैले इस व्यापक शोध कार्य की अपनी चुनौतियां हैं। वित्तीय संसाधन, दीर्घकालिक स्थिरता, विरोधाभासी स्रोतों की प्रस्तुति और शैक्षणिक समुदाय का विश्वास अर्जित करना - ये सब महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। डिजिटल मंचों को नियमित रूप से अद्यतन और सुलभ बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण है। बहुत सारी डिजिटल परियोजनाएं शुरुआती उत्साह के बाद धीरे-धीरे निष्क्रिय हो जाती हैं।
कृष्ण विरासत के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण की आवश्यकता निर्विवाद है। श्रीकृष्ण पाथेय न्यास और सनातन विजडम की यह साझेदारी इस दिशा में एक गंभीर प्रयास दिखती है। जगन्नाथ और विट्ठल जैसे कृष्ण के अन्य रूपों को भी शामिल करने का निर्णय इस बात का संकेत है कि यह केवल एक सीमित परियोजना नहीं बल्कि एक व्यापक सांस्कृतिक दस्तावेजीकरण का प्रयास है। यह परियोजना अपने दावों को कितनी गंभीरता से पूरा करती है और कितना गहन शोध प्रस्तुत कर पाती है, यह समय बताएगा।





