गणगौर पूजन में होलिका दहन की राख का होता है खासा महत्व
गणगौर पूजन में होलिका दहन की राख का होता है खासा महत्वगणगौर पूजन में होलिका दहन की राख का होता है खासा महत्वगणगौर पूजन में होलिका दहन की राख का होता ह

गणगौर पूजन में होलिका दहन की राख का होता है खासा महत्व मिथिलेश सिंह: साहिबगंज। मारवाड़ी समाज की महिलाओं में इन दिनों गणगौर पूजन की धूम मची है। गणगौर का शुभारंभ होली के दिन से होता है। दरअसल, सुहागनों की ओर से पति की दीर्घायु को लेकर होली के बाद गणगौर पूजन करती हैं। गणगौर विवाहिता के अलावा कुंवारी कन्याएं भी करती हैं। गणगौर त्योहार विवाहिताओं के लिए खासा महत्व रखता है क्योंकि इस पूज के दौरान वे अपने सुहाग के स्वस्थ जीवन व स्वस्थ वैवाहिक संबंधों के लिए भगवान शिव व माता गौरा यानि पार्वती की पूजा करती हैं। यह विशेष रूप से मारवाड़ी समाज में काफी हर्षोल्लास से मनाया जाता है।
मारवाड़ी समाज की वैसी नवविवाहिता जिनकी शादी के बाद पहली होली होती है वह गणतौर जरुर करती है। गणगौर मुख्य रूप से दो शब्द गण और गौर से बना है। इसमें गण का अर्थ शिव व गौर का अर्थ माता पार्वती है। धार्मिक मान्यता है की इस पूजन अवधि के दौराना माता पार्वती सोलह श्रृंगार कर सुहागनों को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद देने निकलती हैं। इसी कारण व्रती महिलायें इस दिन शिव-पार्वती की पूजा करती है। 16 दिनों तक होगी भगवान शिव-पार्वती की पूजा होलिका दहन के अगले दिन से ही गणगौर का पूजन शुरू हो जाता है । यह 16 दिनों तक अनवरत चलता है। इस बार यह चार मार्च से शुरू होगा। गणगौर के लिए होलिका दहन की राख का काफी महत्व होता है। गणगौर पूजन के लिए शिव-पार्वती की मिट्टी से प्रतिमा या आकार बना कर विशेष रूप से पूजा की जाती है और गीत गाये जाते हैं। सोलह दिन तक व्रती रोजाना विधिवत रूप से गणगौर पूजन करेंगी। इस व्रत का समापन चैत्र नवरात्र के तीसरी नवरात्र को होता है। इस दिन व्रत-पूजा आदि कर कथा सुनती हैं । माता गौरा के लिए मैदा, बेसन, आटे आदि में हल्दी मिलाकर गहने बना गौरा को चढ़ाती है। रंगोत्सव से शुरू हो जायेगा पूजन नवविवाहिता जिनकी विवाहोपरांत पहली होली होती है। वह अपने ससुराल या फिर मायके में गणगौर पूजन करती है। इसके लिए विधि विधान से गणगौर बैठाया जाता है। गणगौर अकेले नहीं जोड़े के साथ पूजन होता है। इसके लिए व्रती की ओर से अपने साथ अन्य सोलह कुंवारी कन्याओं को भी पूजन के लिए सुपारी देकर निमंत्रित करती है। इसके बाद सोलह दिन तक विधिपूर्वक पूजन करती है। मारवाड़ी समाज की ओर से कहा जाता है कि होलिका दहन के दुसरे दिन यानि रंगोत्सव जिसे पड़वा कहा जाता है के दिन से गणगौर का विधिवत शुरूआत होता है। कई जगह सामूहिक रूप से गणगौर पूजन भी होता है।
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