तीसरा वार्षिक सम्मेलन : संताली साहित्य के संरक्षण व विकास पर जोर

हिन्दुस्तान, साहिबगंज
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साहिबगंज में अखिल भारतीय संताली लेखक संघ का तीसरा वार्षिक सम्मेलन आयोजित हुआ। मुख्य अतिथि चुण्डा सोरेन सिपाही ने संताली भाषा और संस्कृति की समानता पर जोर दिया। भुजंग टुडू ने संताली साहित्य के विकास में ओल चिकी लिपि के महत्व को रेखांकित किया। इस अवसर पर कई पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया।

तीसरा वार्षिक सम्मेलन : संताली साहित्य के संरक्षण व विकास पर जोर
साहिबगंज। अखिल भारतीय संताली लेखक संघ संताल परगना जोन का तीसरा वार्षिक सम्मेलन सह साहित्यिक संगोष्ठी रविवार को स्थानीय बड़ा पचगढ़ स्थित स्वयंवर बैंक्वेट हॉल में हुई। बतौर मुख्य अतिथि वरिष्ठ संताली लेखक चुण्डा सोरेन सिपाही व विशिष्ट अतिथि साहित्य अकादमी पुस्कार विजेता भुजंग टुडू ने शिरकत की। उद्घाटन बतौत मुख्य अतिथि समेत अन्य अतिथियों ने संताल हूल के नायक सिदो-कान्हू एवं पंडित रघुनाथ मुर्मू की तस्वीर पर माल्यार्पण व दीप प्रज्वलित कर किया । मौके पर मुख्य अतिथि संताली लेखक चुण्डा सोरेन सिपाही ने कहा कि विश्व के विभिन्न हिस्सों में रह रहे संताल की भाषा संस्कृति में समानता है। यह इस बात की पुष्टि करता है कि हम सभी संताल एक है। हमें गर्व होना चाहिए कि हमारे बीच समान युनिक संस्कृति, भाषा व सर्वमान्य लिपि है। ओल चिकी लिपि से ही संताली साहित्य का संरक्षण व विकास संभव है। संगोष्ठी में वरिष्ठ संताली साहित्यकार व साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता भुजंग टुडू ने कहा कि चुण्डा सोरेन सिपाही जैसे महान साहित्यकार के नेतृत्व में संताल परगना क्षेत्र में संताली साहित्य का तेजी से विकासत हो रहा है। इससे युवाओं को प्रेरण लेना चाहिए । संताली साहित्य के विकास में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि जब साहित्य जीवित रहेगा तो हमारा अस्तित्व भी जीवित रहेंगे। इसलिए भारत सरकार ने संताली भाषा के लिए ओलचिकी लिपि को मान्यता दी है। नि:संकोच ओल चिकी लिपि से ही संताली साहित्य का विकास व संरक्षण संभव है। झारखंड शाखा के अध्यक्ष रजनीकांत मरांडी ने कहा कि ओल चिकी लिपि के सौ साल पूरे होने पर दिल्ली में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ओलचिकी के जनक पंडित रघुनाथ मुर्मू के सम्मान में डाक टिकट व सौ रुपए का सिक्का जारी किए हैं। निश्चित रूप से यह हमारे लिए यह गर्व का विषय है। केन्द्रीय कमेटी के उपाध्यक्ष मानिक हांसदा ने बताया कि अग्रेज के समय में संताली साहित्य के विकास व संरक्षण करने में पीओ वोडिंग की अहम भूमिका रही है। उनका अनुसरण करते हुए आज संताली साहित्य को आगे विकसित व संरक्षण कैसे किया जाए, यह चुनौती हमलोगों के सामने हैं। कार्यक्रम का संचालन सुशील हांसदा ने किया। धन्यवाद ज्ञापन नाजिर हेम्ब्रम ने किया। संगोष्ठी में मसीह मरांडी परगना, सामुएल मुर्मू,क्लेमेन्ट सोरेन, अगस्टीन हेम्ब्रम, बुढ़ान चन्द्र मुर्मू, विजय लाल मरांडी, शिबू टुडू, गोपीन किस्कू, मोनज टुडू, मंजू हांसदा, पुष्पा हेम्ब्रम, नितिन कांहू हांसदा, रवीन्द्र मरांडी, टेकलाल मरांडी, सुशील सोरेन, सोनी किस्कू,मेरी मुर्मू, सुंदरलाल सोरेन, विनय टुडू, बादल हेम्ब्रम, सुधीर चन्द्र सोरेन, कालीदास मुर्मू समेत काफी संख्या में संताली साहित्य प्रेमियों ने मुख्य रूप से शामिल हुए।

पुस्तक का लोकापर्ण

संगोष्ठी में चुण्डा सोरेन सिपाही लिखित पुस्तक संताली रोनोड़, त्रिमासिक पत्रिका फुरगाल आड़ाङ, शिवलाल मरांडी लिखित कोयोक दाराम व एइसवा संताल परगना जोन की स्मारिका का लोकार्पण किया गया।

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