तय समय और प्रारूप में प्रमाणपत्र देने पर ही मिलेगा आरक्षण, क्यों बोला झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि आरक्षण का लाभ केवल उसी अभ्यर्थी को मिल सकता है जिसने निर्धारित समय सीमा के भीतर सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी की हों।

झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि आरक्षण का लाभ केवल उसी अभ्यर्थी को मिल सकता है जिसने निर्धारित समय सीमा के भीतर सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी की हों। यदि अभ्यर्थी विज्ञापन में निर्धारित कट-ऑफ तिथि तक निर्धारित प्रारूप में जाति प्रमाण पत्र प्रस्तुत नहीं करते हैं, तो उन्हें आरक्षित श्रेणी का लाभ नहीं दिया जा सकता। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने गुरुवार को जेपीएससी और जेएसएएससी की नियुक्ति परीक्षाओं में जाति प्रमाण पत्र के आधार पर आरक्षण लाभ से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए 22 अभ्यर्थियों की अपील याचिकाएं खारिज कर दी। अदालत ने माना कि चयन आयोगों द्वारा ऐसे अभ्यर्थियों को सामान्य श्रेणी में मानना पूरी तरह वैध और नियमसम्मत है।
इन परीक्षाओं में डॉक्टर, पुलिस अवर निरीक्षक, रेडियो ऑपरेटर, शिक्षक समेत कई पदों की नियुक्तियां शामिल थीं। सभी मामलों में अभ्यर्थियों ने दावा किया था कि वे आरक्षित वर्ग से संबंधित हैं, लेकिन ऑनलाइन आवेदन के समय उन्होंने निर्धारित प्रारूप वाला जाति प्रमाण पत्र जमा नहीं किया था। बाद में दस्तावेज सत्यापन या शो-कॉज के दौरान प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया।
विज्ञापन की शर्तें सभी अभ्यर्थियों पर समान रूप से लागू
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि विज्ञापन की शर्तें सभी अभ्यर्थियों पर समान रूप से लागू होती हैं और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता बनाए रखने के लिए उनका कड़ाई से पालन आवश्यक है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि कट-ऑफ तिथि के बाद प्रमाण पत्र स्वीकार किए जाएं, तो इससे उन अभ्यर्थियों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने नियमों का पालन करते हुए आवेदन ही नहीं किया। अपीलकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट के राम कुमार गिजरोया मामले का हवाला दिया गया। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि वह फैसला विशेष परिस्थितियों में दिया गया था और उसे हर मामले में लागू नहीं किया जा सकता।
कट-ऑफ तिथि के अनुसार पात्रता करनी होगी साबित
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के बाद के फैसलों दिव्या बनाम भारत संघ, कर्ण सिंह यादव तथा साक्षी अरोड़ा मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि जहां विज्ञापन में स्पष्ट कट-ऑफ तिथि निर्धारित हो, वहां अभ्यर्थियों को उसी के अनुसार पात्रता साबित करनी होगी। कोर्ट ने यह भी माना कि जेपीएससी और जेएसससी द्वारा जारी विज्ञापनों की शर्तें संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हैं। विज्ञापनों में साफ उल्लेख था कि झारखंड सरकार द्वारा निर्धारित प्रारूप में जाति प्रमाण पत्र का विवरण ऑनलाइन आवेदन में देना अनिवार्य होगा, अन्यथा अभ्यर्थी सामान्य वर्ग में माने जाएंगे।
क्या है मामला
डॉ नूतन इंदवार सहित 22 अन्य की ओर से हाईकोर्ट में अपील दाखिल की गई थी। अदालत को बताया गया कि कुछ प्रार्थियों ने जेपीएससी और कुछ ने जेएसएससी की ओर से जारी विज्ञापन में आवेदन दिया था। लेकिन आयोग ने इनकी जाति प्रमाण पत्र को नहीं मानते हुए इन्हें सामान्य श्रेणी में शामिल कर लिया। इसलिए इनका चयन नहीं हो पाया। इन्होंने अपनी श्रेणी में निर्धारित कट आफ मार्क्स से ज्यादा अंक प्राप्त किया है। इसलिए उन्हें आरक्षण का लाभ देते हुए उनका चयन किया जाना चाहिए। इस पर जेपीएससी की ओर से अदालत को बताया गया कि प्रार्थियों का विज्ञापन की शर्तों के अनुरूप जाति प्रमाण पत्र नहीं था। विज्ञापन जारी होने के बाद शर्तों में बदलाव नहीं किया जा सकता है। इसलिए इन्हें सामान्य श्रेणी में रखा गया था।
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