पारंपरिक उरांव चित्रकला पर कार्यशाला का शुरू
रांची में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र और विकास भारती द्वारा पारंपरिक उरांव चित्रकला पर पांच दिवसीय कार्यशाला की शुरुआत हुई। यह कार्यशाला 23 जनवरी तक चलेगी, जिसमें प्रसिद्ध उरांव कलाकारों द्वारा छात्रों को चित्रकला की तकनीक और उरांव समाज की सांस्कृतिक धरोहर के बारे में बताया जाएगा।

रांची, विशेष संवाददाता। झारखंड की समृद्ध आदिवासी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण व संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) क्षेत्रीय केंद्र, रांची और विकास भारती, बिशुनपुर (गुमला) की ओर से पारंपरिक उरांव चित्रकला पर पांच दिवसीय कार्यशाला की शुरुआत सोमवार को हुई। कार्यशाला 23 जनवरी तक चाला पाचो सभागार, ज्ञान निकेतन, विकास भारती, बिशुनपुर में चलेगी। विकास भारती के संयुक्त सचिव महेंद्र भगत ने कहा कि आदिवासी कला और संस्कृति को जीवित रखने में कलाकारों, संस्थानों और प्रशिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने युवाओं से लोक व जनजातीय कलाओं से गहराई से जुड़ने का आह्वान किया।
आईजीएनसीए क्षेत्रीय केंद्र, रांची के क्षेत्रीय निदेशक डॉ कुमार संजय ने कार्यशाला का उद्देश्य बताते हुए ग्रामीण परिवेश को आयोजन स्थल के रूप में चुने जाने के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि ग्रामीण पृष्ठभूमि से आनेवाले छात्र-छात्राएं बाहरी प्रभावों से अपेक्षाकृत मुक्त होते हैं, जिससे वे लोक कलाओं को अधिक प्रामाणिक रूप से समझ और आत्मसात कर सकते हैं। कार्यशाला की संयोजक व विकास भारती की प्रतिनिधि कुमकुम मैत्रा ने विभिन्न विद्यालयों से आए छात्र-छात्राओं का परिचय कराया। कार्यशाला में प्रसिद्ध उरांव लोक कलाकार सुमंती भगत और प्रीति बाला गाड़ी के मार्गदर्शन में प्रतिभागी प्राकृतिक रंगों, मिट्टी और पारंपरिक प्रतीकों के माध्यम से उरांव चित्रकला की तकनीकों का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। प्रशिक्षण के दौरान सिर्फ चित्रकला की तकनीक ही नहीं, बल्कि उरांव समाज का जीवन-दर्शन, सामाजिक मूल्य, सांस्कृतिक कथाएं और आध्यात्मिक भावनाएं भी छात्रों को समझाई जा रही हैं।
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