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आसछे मकर दू दिन सबुर कर...पर झूमे युवा

आसछे मकर दू दिन सबुर कर...पर झूमे युवा

संक्षेप:

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय में टुसू पर्व का आयोजन धूमधाम से किया गया। छात्रों ने पारंपरिक गीतों और नृत्य के साथ समारोह का आनंद लिया। मुख्य अतिथि डॉ. धनंजय वासुदेव द्विवेदी ने इसे कृषि सभ्यता का प्रतीक बताया। टुसू पर्व धान की कटाई के बाद मनाया जाता है और इसका सांस्कृतिक महत्व है।

Jan 10, 2026 07:42 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, रांची
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रांची, विशेष संवाददाता। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (डीएसपीएमयू) का अखड़ा शनिवार को टुसू पर्व के उल्लास से गुलजार रहा। विश्वविद्यालय के अखड़ा में आयोजित टुसू मिलन समारोह में ढोल-मांदर की थाप पर झूमते-गाते छात्र-छात्राओं ने टुसू की सामाजिक-सांस्कृतिक विहंगमता की मनोरम छटा बिखेरी। आसछे मकर दू दिन सबुर कर, ओ तुईं साड़ी धोती जोगाड़ कर... जैसे गीतों पर थिरकते कदमों ने परिसर को उत्साह से सराबोर कर दिया। समारोह की शुरुआत टुसू के स्वरूप ‘चौडल’ की पारंपरिक विधि-विधान से स्थापना के साथ हुई। इससे पहले कुरमाली विभाग के छात्र-छात्राओं ने नृत्य-संगीत के साथ विश्वविद्यालय परिसर में चौडल की शोभायात्रा निकाली।

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मुकेश कुमार महतो ने टुसू का सेउरन पाठ किया, जिसके बाद चौडल पर पुष्पार्पण व चुमावन किया गया। मुख्य अतिथि रजिस्ट्रार डॉ. धनंजय वासुदेव द्विवेदी ने कहा कि टुसू कृषि सभ्यता के विकास का प्रतीक है। परीक्षा नियंत्रक डॉ. शुचि संतोष बरवार ने कहा कि ऐसे आयोजन हमें अपनी संस्कृति से जुड़ने का अवसर देते हैं। हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. जिंदर सिंह मुंडा ने कहा कि झारखंड के पर्व यहां की भाषा और सभ्यता की विशेष पहचान हैं। जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय के समन्वयक डॉ. बिनोद कुमार ने कहा कि टुसू धान की कटाई के बाद पूस महीने के अंत में मनाया जाने वाला प्रमुख पर्व है। डॉ. निताई चंद्र महतो ने बताया कि इसकी शुरुआत जेठ महीने में बीज रोपने के साथ ही हो जाती है। अगहन संक्रांति को टुसू स्थापना के बाद पूरे पूस महीने आराधना होती है और मकर संक्रांति के दिन विसर्जन किया जाता है। मौके पर प्रचलित टुसू गीतों और नृत्य ने सबको झूमने पर मजबूर कर दिया। आयोजन जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के सहयोग से किया गया। कार्यक्रम में वित्त पदाधिकारी डॉ. अनीता मेहता सहित डॉ. पारितोष मांझी, डॉ. तनुजा, डॉ. अजिता, डॉ. रियाज हसन, डॉ. डुमनी माई मुर्मू, करमा कुमार, डॉ. जगदंबा प्रसाद सिंह व अन्य उपस्थित थे। संचालन शोधार्थी अशोक कुमार पुराण व धनेश्वर महतो ने किया।