
टुसू सिर्फ उत्सव नहीं, लोक परंपरा और प्रकृति का संगम : राज्यपाल
रांची में टुसू महोत्सव का आयोजन कुरमाली भाषा परिषद द्वारा किया गया। राज्यपाल संतोष गंगवार ने इसे ऐतिहासिक और पारंपरिक दिन बताया। इस महोत्सव का उद्देश्य लोक परंपरा और सामाजिक चेतना को मजबूत करना है। कार्यक्रम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आयोजन किया गया और विभिन्न अतिथियों ने इस उत्सव की महत्ता पर प्रकाश डाला।
रांची, वरीय संवाददाता। टुसू महोत्सव का आयोजन कुरमाली भाषा परिषद ने मंगलवार को मोरहाबादी में किया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राज्यपाल संतोष गंगवार ने कहा कि आज का दिन ऐतिहासिक और पारंपरिक दिन है। टुसू महोत्सव सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि लोक परंपरा, प्रकृति का संगम है। उन्होंने कहा कि टुसू मानव जीवन और प्रकृति के बीच आस्था का जीवंत रूप भी है। यह उत्सव सामाजिक चेतना को मजबूत भी करता है। आत्मिक संबंध को भी स्थापित करता है। राज्यपाल ने कहा कि हमारी परंपरा अतीत की नहीं है, बल्कि वर्तमान को भी दिशा देती है। इसके अलावा सामाजिक समरस्ता को बनाने का काम करती है।
उन्होंने कहा कि झारखंड के लोग लोक कला-परंपरा से जुड़े लोग है। राज्य की महिलाएं मेहनती है और बेहतर कार्य कर रही है। मौके पर पूर्व सांसद शैलेंद्र महतो ने कहा कि हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी धूमधाम से यह उत्सव मना रहे है, इसके लिए सभी को शुभकामना। इससे पहले कार्यक्रम का शुभारंभ दीप जलाकर किया गया और राष्ट्रगान गाया गया। इस दौरान रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ, जिसमें टुसू आधारित कई लोक कलाओं व गीतों-नृत्यों की प्रस्तुति की गई। मौके पर बुधदेव महतो, सत्यनारायण महतो, संजय मेहता, मुक्तिपद महतो, बीएन प्रमाणिक, वर्णमाली महतो, ज्ञानेश्वर सिंह के अलावा डॉ नीणा महतो, वंशीधर महतो, जयंती कुमारी, सुनिता कुमारी सहित कई मौजूद थे। अपनी संस्कृति छोड़ने वाला समाज विलुप्त हो जाता है : सेठ विशिष्ट अतिथि रक्षा राज्यमंत्री संजय सेठ बोले, जो समाज अपनी भाषा, संस्कृति छोड़ देता है, वह समाज व देश आगे नहीं बढ़ सकता और विलुप्त हो जाता है। यह उत्सव धान की खेती सहित महिला सशक्तिकरण का पर्व है। इस उत्सव में मंत्रोच्चार नहीं, बल्कि लोक गीत गाये जाते हैं। परिषद के डॉ राजा राम महतो ने कहा कि टुसू की अहमियत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस टुसू महोत्सव रांची में 24 वर्षो से करते आ रहे है। यह 15 दिसंबर से 14 जनवरी तक मनाई जाती है। टुसू में लोग नए कपड़े पहनते हैं और टुसू के पकवान बनाते हैं। इस त्योहार के बाद ही नया काम शुरू करते हैं। टुसू झारखंड के स्वाभिमान का प्रतीक हैं। कई ग्रामीण इलाकों से लायी गई टुसू की झांकी अनगड़ा, खूंटी अड़की पिस्काहातू, कोड़दा बुंडू, सोनाहातू, राहे, ओरमांझी सहित कई जगहों से टुसू झांकी के रूप में चौड़ल लगाए गए थे। जो पांच फीट से लेकर 100 फीट तक के थे। 100 फीट का टुसू और 45 फीट से ऊंची चौड़ल आकर्षक का केंद्र था। चौड़ल के सबसे उपर में सरना झंडा भी लगाया गया था।

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