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झारखंड में तीन पार्टियों के अध्यक्षों की प्रतिष्ठा दांव पर

झारखंड के लोकसभा चुनाव के अखाड़े में इस बार तीन दलों झामुमो, भाजपा और झाविमो के अध्यक्ष की भी अग्नि परीक्षा होगी। उनके सामने एक तो अपनी चुनावी वैतरणी पार लगाने और दूसरी पार्टी की साख बचाने की भी चुनौती है। राज्य गठन के बाद हुए तीन लोकसभा चुनाव में पार्टी अध्यक्षों को जीत- हार दोनों का सामना करना पड़ा है।

शिबू, बाबूलाल और गिलुवा हैं मैदान में: इस बार एनडीए और महागठबंधन के बीच लड़ाई है। एक ओर भाजपा, आजसू, लोजपा, जदयू साथ हैं। तो दूसरी तरफ कांग्रेस, झामुमो, झाविमो और राजद साथ है। झामुमो अध्यक्ष शिबू सोरेन दुमका लोकसभा सीट से एक बार फिर मैदान में हैं। झाविमो अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी कोडरमा और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा सिंहभूम से चुनाव मैदान में हैं। भाजपा ने शिबू सोरेन और बाबूलाल मरांडी को हराने के लिए ताकत झोंक रखी है, तो महागठबंधन लक्ष्मण गिलुवा को हराने के रणनीति बना रहा।

हार-जीत का चलता रहा है सिलसिला: झारखंड गठन के बाद अब तक तीन लोकसभा चुनाव 2004, 2009 और 2014 में हुए हैं। प्रत्याशियों को पार्टी अध्यक्ष रहते हुए भी हार-जीत का सामना करना पड़ा है। शिबू सोरेन तीनों चुनाव में अध्यक्ष रहते हुए जीते थे। झाविमो प्रमुख बाबूलाल मरांडी पिछले चुनाव में दुमका से लड़े थे। उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। इससे पहले वह 2009 में अध्यक्ष रहते हुए कोडरमा से जीते थे। भाजपा के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष रवींद्र राय कोडरमा से 2014 में चुनाव जीते थे।

तत्कालीन कांग्रेस के थॉमस हांसदा को 2004 में राजमहल सीट से हार का सामना करना पड़ा था। आजसू के अध्यक्ष सुदेश महतो भी 2014 के लोकसभा चुनाव में रांची से हार गए थे। भाजपा के दिनेशानंद गोस्वामी को 2011 में हुए जमशेदपुर लोकसभा उपचुनाव में अध्यक्ष रहते हार का सामना करना पड़ा था। इसी तरह बाबूलाल मरांडी ने 2006 में कोडरमा उपचुनाव में जीत हासिल की थी।

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  • Web Title: The prestige of the chairmen of three parties in Jharkhand at stake