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30 मार्च, 2021|2:45|IST

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जरूरत स्मार्ट सिटी की नहीं, स्मार्ट गांव की है: स्वामी काडसिद्धेश्वर

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रांची। प्रमुख संवाददाता

देश की प्रगति ग्रामीण उद्यमिता के विकास से ही संभव है। भारत जब तक मालिकों का देश था, तब तक यहां की जीडीपी 40 प्रतिशत थी। लेकिन जब से हम मालिक से नौकर बने, तब जीडीपी सात प्रतिशत पर आ गई है। ग्रामीण जीवनशैली हमें आत्मनिर्भर बनाती थी। लेकिन स्वतंत्रता के बाद पश्चिम के अंधानुकरण ने उद्योगों का केंद्रीकरण कर दिया। नतीजतन रोजगार की तलाश में ग्रामीणों का शहरों में पलायन बढ़ा। भारत गांव का देश है, मगर हम स्मार्ट शहर बनाने में लगे हैं, जबकि जरूरत है स्मार्ट गांव बनाने की। यह कहना है कनेरी मठ, कोल्हापुर के स्वामी काडसिद्धेश्वर का। सोमवार को झारखंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी-जनजातीय विकास एवं ग्रामीण उद्यमिता के उद्घाटन सत्र में वह बतौर मुख्य अतिथि मौजूद थे।

उन्होंने कहा कि पिछले 70 सालों में हमने विकास कम और प्राकृतिक संसाधनों का विनाश अधिक किया है। अधिक उत्पादन के लिए खेतों को रासायनिक खाद और कीटनाशक का जहर दिया जा रहा है। इससे जैविक संतुलन बिगड़ गया। अनाज में सूक्ष्म पोषक तत्व काफी घट गया है, जिसे खाकर हम बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। उन्होंने महात्मा गांधी को उद्धृत करते हुए कहा कि जिस शिक्षा में शील न हो, जिस तकनीकी में अमानवीयता हो, उससे विकास संभव नहीं। इस असमानता को पाटने के लिए हमें छोटे-छोटे उद्योग की ओर लौटना होगा। तकनीकी को गांव-गांव तक ले जाना होगा। किसानों की आय बढ़ाने के लिए अभिनव खेती का विकल्प देना होगा। उन्होंने कहा कि कई शिक्षण संस्थानों को देखकर लगता है कि इन्हें बंद कर देना चाहिए, क्योंकि यहां ग्रामीणों को जानवरों से भी बदतर समझनेवाली पीढ़ी का निर्माण हो रहा है। संगोष्ठी में सोलर मैन ऑफ इंडिया के रूप में विख्यात दीपक गढ़िया, बेबी कॉर्न उत्पादन के लिए प्रसिद्ध कंवल सिंह चौहान (पद्मश्री), महोबा से आए धर्मेंद्र मिश्र, बिहार से आए संजय सज्जन समेत अन्य विशेष विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता झारखंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ प्रदीप कुमार मिश्र ने की।

सौर ऊर्जा पर काम करने की जरूरत : दीपक गढ़िया

संगोष्ठी में आए देश का सबसे बड़ा सोलर किचन बनानेवाले दीपक गढ़िया ने झारखंड में सौर ऊर्जा आधारित उद्यमों के विकास पर जोर दिया। दीपक गढ़िया ने शिरडी साईंबाबा मंदिर, तिरुपति मंदिर और लद्दाख में सेना के जवानों के लिए सोलर थर्मल किचन बनाया है, जिसमें 50,000 लोगों का खाना एक साथ बन सकता है। उन्होंने कहा कि सौर ऊर्जा के माध्यम से झारखंड में विकास के नए द्वार खुलेंगे। उन्होंने जनजातीय समुदाय के पारंपरिक प्राकृतिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक के बीच सही समन्वय के साथ काम करने की जरूरत बतायी। कहा कि सौर ऊर्जा के क्षेत्र में झारखंड में काफी संभावनाएं हैं।

खेती से बन सकते हैं सफल उद्यमी : कंवल सिंह चौहान

सोनीपत से आए पद्मश्री से सम्मानित कंवल सिंह चौहान ने पारंपरिक खेती अपनाने पर जोर दिया। कहा कि 1960 में हरित क्रांति आई, इसके बाद रासायनिक खेती ने जोर पकड़ा। इससे अन्न का उत्पादन तो बढ़ गया, लेकिन गुणवत्ता घट गई। 1980 के बाद कीटनाशक और खरपतवार नाशक का प्रयोग बढ़ गया। 1985 के बाद रासायिक खेती का नुकसान दिखने लगा, जिसका असर किसानों पर पड़ा है। पारंपरिक खेती पर उन्होंने कहा कि एक गाय से 20 से 30 एकड़ की खेती हो सकती है, बिना रासायनिक खाद का उपयोग किए। कृषि वैज्ञानिकों को इस पर ध्यान देना चाहिए। अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि बेबीकॉर्न की खेती से शुरुआत की। पहली ही फसल में काफी फायदा हुआ। उन्होंने झारखंड में एग्रीकल्चर क्लस्टर बनाने पर जोर दिया। कहा खेती से एक सफल उद्यमी भी बन सकते हैं।

युवा उद्यम को पहली पसंद बनाएं : प्रो प्रदीप कुमार मिश्र

जेयूटी के कुलपति प्रो प्रदीप कुमार मिश्र ने कहा कि विश्वविद्यालयों से निकलने वाले विद्यार्थियों को यह पता ही नहीं होता कि उन्हें करना क्या है। युवा नौकरी के लिए भटकता है। विद्यार्थियों को सिर्फ नौकरी करने वाला नहीं बनाना है, उन्हें उद्यमिता की राह पर चलना होगा। विद्यार्थियों की पहली पसंद उद्यमी बनना होना चाहिए। उन्होंने जल संकट का मुद्दा भी उठाया। कहा कि जल स्रोत धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। पूरे विश्व के पानी को एक गोले में भर दिया जाए तो 1360 किमी का व्यास होगा। यदि मीठे पानी का गोला बनाएं तो 273 किमी व्यास होगा। वहीं, नदियों और झीलों के पानी को एक जगह किया जाए तो उसका व्यास सिर्फ 52 किमी व्यास होगा। इससे समझा जा सकता है कि पीने योग्य पानी कितना कम है।

विकास के जनजातीय मॉडल पर जोर रहा

तकनीकी सत्र में विभिन्न क्षेत्रों ने आए विषय विशेषज्ञों ने विकास के जनजातीय मॉडल को अपनाने पर जोर दिया। महोबा से आए धर्मेंद्र मिश्र ने कहा कि बिना जल के जीवन की परिकल्पना की ही नहीं जा सकती है। अपने अनुभवों को साझा करते हुए कहा कि बुंदेलखंड में पानी की बहुत कमी है। गर्मियों में तमाम परिवार घर छोड़कर शहर चले जाते हैं। हमने अपने क्षेत्र में खेत-तालाब बनाने का प्रयोग किया। पहली ही बारिश में तालाब भर गए। इन तालाबों से न सिर्फ सिंचाई होती है, बल्कि जलस्तर भी बढ़ गया। इससे उत्साहित होकर हमने दौ सौ तालाब बनाने का प्रयास किया। इस मॉडल को पूरे उत्तर प्रदेश में लागू किया गया है।

विकास के क्रम में हम प्रकृति को भूलते जा रहे हैं

औरंगाबाद बिहार से आए संजय सज्जन ने विलुप्त हो चुकी रामरेखा नदी को जनसहयोग से पुनर्जीवित करने के अपने अनुभव साझा किए। एक्शन एड इंडिया संस्था, ओडिशा की बरतिंदी जेना ने कहा कि विकास के क्रम में हम प्रकृति को भूल गए हैं। सबसे ज्यादा संकट पानी को लेकर है। प्रकृति संरक्षण में हम आदिवासी समुदाय के ज्ञान और परंपरा का उपयोग कर सकते हैं। द्वितीय तकनीकी सत्र में विष्णु छेत्री, अजय सुमन शुक्ल, कमला सिंह, राजकुमार ने भी अपने अनुभव साझा किए। कार्यक्रम में संगोष्ठी के संयोजक विमल कुमार सिंह, जेटीयू के रजिस्ट्रार डॉ कुणाल कुमार, रांची विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ रमेश पांडेय, एसबीयू के कुलपति प्रो गोपाल पाठक, डॉ एसके सिंह, अजय कुमार सिंह, डॉ अवधेश दीक्षित, प्रमोद कुमार समेत विभिन्न तकनीकी शिक्षण संस्थानों के प्राध्यापक मौजूद थे। संचालन अजय सुमन, डॉ शालिनी सिंह और पूजा गुप्ता ने किया।

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  • Web Title:Smart village is needed not smart city Swami Kadsiddheshwar