DA Image
16 जनवरी, 2021|2:05|IST

अगली स्टोरी

मलिन बस्तियों में पसरा रहा सन्नाटा

default image

रांची। वरीय संवाददाता

राजधानी में शुक्रवार को रात में नए साल के स्वागत में जहां सामर्थ्यवान लोग मौज-मस्ती करते रहे। कई इलाके उल्लास में डूबे रहे, वहीं मलिन बस्तियों में दो जून की रोटी की जुगाड़ मे दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करने वाले अभावग्रस्त परिवार के लोग थके हारे सुकून की नींद में सोए हुए थे। ऐसी बस्तियों में कोई भी नए साल के स्वागत की खुशियां मनाने नहीं आया। आलम यह रहा कि मलिन बस्तियों और शहरी गरीब की कॉलोनी में रात में सन्नाटा पसरा रहा। देर रात कहीं-कहीं से काम कर लौटे जरूरतमंद परिवार के लोगों का कहना था कि हमारे लिए क्या पुराना और नया साल। ऐसे आयोजन तो बड़े और धनाढ्य लोगों के लिए हैं जिनके पास हर तरह की खुशी हासिल करने के इंतजाम है। हम तो आज किसी तरह अपना दिन काट ते हैं तो कल की चिंता से बैचेन भी रहते हैं। ऐसे में हमलोग क्या नया साल मनाएंगे। कभी कोई भी बड़े लोग हमलोगों के पास खुशियां बांटने नहीं आते हैं। कोरोना को लेकर नौ माह से बेहाल हैं। काम नहीं मिल रहा है। पास में पैसे नहीं हैं। अपनी और परिवार की जीविका की चिंता करना ही हमलोगों के नसीब में है।

क्या कहते हैं लोग

मैं होटल में जूठे थाली-प्लेट धोकर पेट पालता हूं। हमलोगों से खुशी बहुत दूर है। हमारे लिए हर दिन काम करना ही त्यौहार है। मैं चाहकर भी हंसने लायक नहीं हूं। अशोक कुमार

हर दिन काम करना है। यही हमारे लिए सबकुछ है। नया साल की खुशी मनाने के लिए भी पास में पैसे चाहिए। वह तो हम जैसे लोगों के पास नहीं है। मन मसोस कर रहते हैं। सौमेन

गली-मुहल्ला में कचरा बीन कर पेट पालती हूं। इससे भी काम नहीं बनता है तो मंदिरों के समीप बैठकर भीख मांगती हूं। किसी तरह परिवार का गुजर-बसर हो, इसी की चिंता हर दिन लगी रहती है। ऐसे में हमलोग नया साल क्या मनाएंगे। शीतल

लोगों को नया साल मनाते देखती हूं। यही हमलोगों के लिए खुशी है। किसी तरह दिन कट रहा है। तीज-त्यौहार के मौके पर हमें कोई पूछने भी नहीं आता है। चरकी