
ठंड में निर्माण धीमा होने से श्रमिक काम से अछूते
हाड़ कंपाती ठंड ने रांची में श्रमिकों का जीवन अस्त-व्यस्त कर दिया है। श्रमिकों का कहना है कि ठंड और बालू की कमी के कारण काम मिलना मुश्किल हो गया है। वे सुबह से काम की तलाश में खड़े रहते हैं, लेकिन कई बार निराश होकर लौटना पड़ता है। किराया और भोजन का खर्च उठाना भी मुश्किल हो रहा है।
हाड़ कंपाती ठंड में जनजीवन अस्त-व्यस्त है। सबसे ज्यादा मजदूरी करने वाले प्रभावित हैं। रांची के चौराहों पर हर सुबह मजदूरी की तलाश में महिला-पुरुष जुटते हैं, लेकिन ठंड में काम धीमा और दूसरी ओर बालू की किल्लत के चलते इन्हें हर दिन काम नहीं मिल रहा। आपके अपने अखबार ‘हिन्दुस्तान’ ने शहर में ऐसे ही पांच स्थानों पर जाकर मजदूरों की पीड़ा को करीब से जानने की कोशिश की... काम नहीं मिलने से मकान का किराया देने भी मुश्किल हरमू चौक रांची, हिटी। हरमू चौक के पास शुक्रवार को बड़ी संख्या में श्रमिक काम की तलाश में खड़े दिखे। हालांकि सुबह में हर दिन राजमिस्त्री, महिला-पुरुष श्रमिक दिख जाएंगे।
काम नहीं मिलने से अधिकांश को निराश होकर लौटना पड़ता है। श्रमिकों के अनुसार ठंड में निर्माण कार्य कम हो रहा है। ऊपर से बालू की किल्लत से भी कार्य प्रभावित है। इससे काम नहीं मिल रहा। ऐसे में परिवार और खुद का पेट भरने में परेशानी होती है। ऊपर से किराए के घर का पैसा देने में दिक्कत होती है। श्रमिकों ने बताया कि दिनभर इंतजार के बावजूद उन्हें काम नहीं मिल पाता। काम की टकटकी में बीत जाता है दिन लालपुर चौक लालपुर चौक के पास हर दिन सुबह 7 बजे बड़ी संख्या में श्रमिक काम की तलाश में आते हैं। ठंड के बीच कई बात तो ये सुबह 10:30 तो कभी 11 बजे तक काम की तलाश में खड़े मिल जाएंगे। शुक्रवार को सुबह 11:30 बजे तक लालपुर चौक के आसपास काफी संख्या में महिला श्रमिक खड़ी मिलीं। इनसे बातचीत की गई तो पता चला कि कंपकंपाती इस ठंड में निर्माण कार्य काफी धीमा हो गया है। इससे दिहाड़ी-मजदूरी मिलने में परेशानी हो रही है। एक महिला श्रमिक के अनुसार, एक महीने में औसतन कभी 15 तो कभी 20 दिन ही काम मिल पाता है। उसने बताया कि वैसे भी बालू की किल्लत से पिछले कई महीनों से निरंतर काम नहीं मिल रहा है। ऊपर से ठंड ने परेशानी और बढ़ा दी है। एक दूसरी महिला श्रमिक ने कहा कि दूसरे जिले से आकर वे रांची में किराये के मकान में रहती हैं, पर कम काम मिलने की वजह से किराए और पेट ही चल रहा है। काम नहीं मिलने से किराया व भोजन तक की दिक्कत रातू रोड चौक रातू रोड चौक पर हर दिन सैकड़ों श्रमिक सुबह सात बजे से ही रोजगार की उम्मीद में आ जाते हैं। श्रमिक सुबह 10:30 से 11 बजे तक काम का इंतजार करते हैं, लेकिन ठंड और निर्माण की सुस्ती से अधिकांश को काम नहीं मिल पाता। महिला श्रमिकों ने कहा, बालू की कमी पिछले कई माह से लगातार काम में बाधा बनी हुई है। ठंड बढ़ने से निर्माण कार्य और धीमा हो गया है, जिससे उनकी दिक्कतें बढ़ गई हैं। कई श्रमिक दूसरे जिलों से आकर किराये के मकानों में रह रहे हैं, लेकिन कम आमदनी के कारण किराया और भोजन का खर्च निकालना भी मुश्किल हो रहा है। श्रमिकों का कहना है कि नियमित काम नहीं मिलने से उनके परिवार की आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। शेड नहीं, खुले में काम का इंतजार बिरसा चौक यहां सुबह सात बजे से श्रमिकों का जुटान शुरू हो जाता है। इस चौक के आसपास खूंटी, तुपुदाना, हुलहुंडु, नया सराय के अलावा रांची के आसपास के कई इलाकों से बड़ी संख्या में श्रमिक-मजदूर प्रत्येक दिन यहां रोजगार की तलाश में इकट्ठा होते हैं। श्रमिकों का कहना है सामान्य दिनों की तुलना में ठंड में ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। खुले आसमान के नीचे ठिठुरा देने वाली ठंड में घंटों तक इंतजार करना पड़ता है। शेड नहीं होने के कारण ठंड लगने का खतरा बना रहता है। हर दिन काम नहीं मिलने से भरण-पोषण में बाधा डिस्टिलरी पुल कोकर डिस्टिलरी पुल के पास भी अब बड़ी तादाद में मजदूर काम की तलाश में पहुंचते हैं। राजमिस्त्री से लेकर महिला-पुरुष श्रमिक प्रत्येक दिन यहां काम की तलाश में रोजाना खड़े रहते हैं। लेकिन काम नहीं मिलने पर इस ठंड में इन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। श्रमिकों के अनुसार हर दिन आधे श्रमिकों को मायूस ही लौटना पड़ता है। हर दिन काम नहीं मिलने की पीड़ा एक श्रमिक ने साझा की। उसने बताया कि बालू की किल्लत के कारण पहले से ही काम मिलने में परेशानी बनी हुई है। वहीं, अब बढ़ती ठंड के कारण निर्माण कार्य भी धीमा हो गया है। ऐसे में उन्हें हर दिन काम नहीं मिल रहा है। इससे उनकी परेशानी और बढ़ गई है। घर-परिवार को चलाने में भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। सुबह सात से आठ बजे के बीच काम की तलाश में रांची के डिस्टिलरी पुल के पास पहुंच जाते हैं। बहुत बार घंटों तक इंतजार करने के बावजूद कोई निर्माण कार्य के लिए नहीं ले जाता है। इससे निराश होकर घर लौटना पड़ता है और मजदूरी भी नहीं मिलती है।

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