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रांची ग्रामीणों को जागरुक करने के लिए साइंटिस्ट ने अपने गांव में ली वैक्सीन

हिन्दुस्तान टीम,रांचीPublished By: Newswrap
Tue, 01 Jun 2021 06:30 PM
 ग्रामीणों को जागरुक करने के लिए साइंटिस्ट ने अपने गांव में ली वैक्सीन

रांची। प्रवीण मिश्र

ऐसा कम ही होता है कि सिमडेगा जैसे जिले के सुदूरवर्ती गांव से निकलकर कोई युवा भारत के प्रतिष्ठित संस्थान बोस इंस्टीट्यूट कोलकाता में वैज्ञानिक बने। यह भी कम होता है कि वह वैज्ञानिक कोलकाता जैसे शहर में कोरोना की वैक्सीन न लेकर अपने गांव में वैक्सीन ले, लेकिन डॉ सिद्धार्थ प्रसाद ने ऐसा ही किया। डॉ सिद्धार्थ ने सिमडेगा के अपने कोनबेगी गांव लौटकर वैक्सीनेशन सिर्फ इसलिए कराया, ताकि ग्रामीण मोटिवेट हों और उनके मन से कोरोना वैक्सीन के प्रति अंधविश्वास दूर हो सके।

डॉ सिद्धार्थ के इसी सोच का परिणाम है कि जिस जिले के गांव में डॉक्टरों की टीम वैक्सीन कैंप में खाली बैठी रहती है, वहां उनके साथ 160 लोगों ने टीका लगवाया। डॉ सिद्धार्थ कहते हैं कि मुझे अपने ऑफिस की ओर से वैक्सीन दी जा रही थी, लेकिन मुझे पता चला था कि मेरे गांव में लोग वैक्सीन नहीं लगवा रहे हैं। वैक्सीन देने के लिए पहुंच रही है टीम के साथ अभद्र व्यवहार किया जा रहा है। तब मैने निर्णय लिया कि गांव लौटकर ही टीका लूंगा। उन्होंने कहा कि 10 मई को मैं गांव लौटा। पहले 14 दिन तक क्वारंटाइन रहा। फिर मैने गांव के लोगों को वैक्सीन के बारे में समझने का प्रयास शुरू किया। लोगों को कहा कि मैं खुद आपलोगों के साथ पहले वैक्सीन लगवाउंगा। जब लोग माने, तब जिला प्रशासन के सहयोग से गांव में विशेष कैंप लगवाया।

घट गयी थी वैक्सीन, दोबारा मंगानी पड़ी

30 मई को कोनबेगी गांव के एक स्कूल में टीकाकरण के लिए कैंप लगाया गया, जिसमें आस-पास के गांव के 160 लोगों ने टीका लगवाया। स्थिति ऐसी थी कि पहली बार में 80 डोज लेकर पहुंची टीम को पास के गांव में लगे कैंप से दो बार वैक्सीन लानी पड़ी। ठेठईटांगर प्रखंड के बीडीओ मनोज कुमार ने बताया कि डॉ सिद्धार्थ गांव के लोगों को जागरुक कर रहे थे। लोग उनका बहुत सम्मान करते हैं। हमें पता चला तो हमलोग भी मिलकर ग्रामीणों को समझाने लगे। कैंप के दिन सेंटर में इतने लोग आए की वैक्सीन घट गयी। हमोलोगों ने पास के गांव में लगे कैंप से वैक्सीन मंगवाकर लोगों को लगाईद्ध

कौन हैं डॉ सिद्धार्थ प्रसाद

सिमडेगा के ठेठईटांगर प्रखंड के कोनेबागी गांव के निवासी डॉ सिद्धार्थ प्रसाद भारत सरकार की स्वायत्त संस्था बोस इंस्टीट्यूट कोलकाता में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। वे उन भारतीय वैज्ञानिकों की टीम का हिस्सा हैं, जो जेनेवा (स्विटजरलैंड) में ब्राह्मंड की उत्पत्ति को जानने के लिए लार्ज हाइड्रोन कोलाइडर (एलसीएच) मशीन के माध्यम से प्रयोग कर रही है। डॉ सिद्धार्थ 2004 में रांची विश्वविद्यालय से भौतिकी विषय में एमएससी करने के बाद स्कॉलरशिप में कोलकाता स्थित परमाणु उर्जा विभाग के अनुसंधान केंद्र से पीएचडी की। 2011 में पोस्ट डॉक्टरेट की पढ़ाई के लिए अमेरिका गए। तीन साल बाद वहां से लौटकर वे बोस इंस्टीट्यूट से जुड़े।

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