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सिङबोंगा की उपासना से मिलता है आत्मिक बल : बगरय ओड़ेया

सिङबोंगा की उपासना से मिलता है आत्मिक बल : बगरय ओड़ेया

संक्षेप:

रनिया प्रखंड के बनई गांव में सरना धर्म सोतो: समिति का तीसरा शाखा स्थापना दिवस मनाया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने भगवान सिङबोंगा की पूजा की और समाज में प्रेम और भाईचारे की भावना को मजबूत करने का आह्वान किया। धर्मगुरु भैयाराम ओड़ेया ने सरना धर्म की प्रकृति आधारित प्राचीनता और आदिवासी समाज के विकास पर जोर दिया।

Jan 18, 2026 07:23 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, रांची
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रनिया, प्रतिनिधि। रनिया प्रखंड के बनई गांव में रविवार को सरना धर्म सोतो: समिति का तीसरा शाखा स्थापना दिवस सह सरना धर्म प्रार्थना सभा श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ आयोजित की गई। इस अवसर पर बाजु मुडा, रतिया मुंडा और जिरगा मुंडा के नेतृत्व में सरना धर्मावलंबियों ने सरना स्थल पर भगवान सिङबोंगा की विधिवत पूजा-अर्चना कर सुख, शांति और खुशहाली की कामना की। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की उपस्थिति से पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूबा रहा। सभा को संबोधित करते हुए धर्मगुरु बगरय ओड़ेया ने कहा कि भगवान सिङबोंगा की स्तुति से आत्मा में भक्ति और श्रद्धा का संचार होता है।

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इससे समाज में प्रेम, भाईचारा और समानता की भावना मजबूत होती है। उन्होंने कहा कि सिङबोंगा की कृपा से लोभ, लालच और अहंकार जैसी बुराइयां दूर होती हैं और जीवन में सुख-शांति आती है। उन्होंने यह भी कहा कि भगवान के सामने सभी समान हैं, इसलिए सभी को समान कृपा प्राप्त होती है। इसके लिए प्रत्येक व्यक्ति को धर्म के मार्ग पर चलकर सामाजिक सौहार्द बनाए रखना चाहिए। मनुष्य, जीव-जंतु और पूरी सृष्टि का सम्मान करना ही सरना धर्म का मूल सिद्धांत है। सरना धर्म प्रकृति आधारित प्राचीनतम धर्म : भैयाराम ओड़ेया धर्मगुरु भैयाराम ओड़ेया ने अपने संबोधन में कहा कि सरना धर्म प्रकृति पर आधारित विश्व का प्राचीनतम धर्म है, जिसमें आज भी सच्चाई, अच्छाई, ईमानदारी और निष्ठा विद्यमान है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि धार्मिक प्रतिस्पर्धा के कारण धीरे-धीरे सरना धर्म की मूल पहचान और अस्मिता कमजोर हो रही है। इसका दुष्परिणाम यह है कि आदिवासी समाज अपनी धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था से दूर होता जा रहा है और जल-जंगल-जमीन से बेदखली की स्थिति भी उत्पन्न हो रही है। उन्होंने आदिवासी समाज के समुचित विकास के लिए सरना धार्मिक-सामाजिक व्यवस्था के संरक्षण और संवर्धन को अनिवार्य बताया। इससे पहले कार्यक्रम के दौरान विभिन्न मंडलियों द्वारा सरना भजन, पारंपरिक गीत-संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी गईं। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से सरना धर्म की परंपराओं, प्रकृति पूजा और सामाजिक मूल्यों का जीवंत प्रदर्शन किया गया। उपस्थित श्रद्धालुओं ने भजनों के साथ सामूहिक रूप से प्रार्थना कर समाज में सुख-शांति और एकता की कामना की। बड़ी संख्या में श्रद्धालु रहे उपस्थित: कार्यक्रम में डॉ. सीताराम मुंडा, मथुरा कंडीर, विश्राम टुटी, बिरसा तोपनो, जीतु पहान, गोपाल मुंडा, रोहित तानी, सुमित गुड़िया, दुलारी बारला, सुशीला कंडुलना, मंगरा मुंडा, गोपाल बोदरा, मानसिंह बारजो और किशुनराय मुडा सहित अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। समारोह में रनिया, तोरपा, तपकारा, मुरहू, गुमला समेत आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में सरना धर्मावलंबी उपस्थित रहे।