हीमोफीलिया-डे : हीमोफीलिया पीड़ित बच्चों के लिए एमिसिजुमैब साबित हो रहा वरदान

हिन्दुस्तान, रांची
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झारखंड में हीमोफीलिया के मरीजों की संख्या बढ़कर 1050 हो गई है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह आनुवंशिक बीमारी रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया में बाधा डालती है। बच्चों में इस बीमारी का समय पर इलाज और प्रोफिलैक्सिस नीति की आवश्यकता है। रांची सदर अस्पताल में फैक्टर की सुविधा उपलब्ध है, लेकिन विशेष जांच लैब की कमी है।

हीमोफीलिया-डे : हीमोफीलिया पीड़ित बच्चों के लिए एमिसिजुमैब साबित हो रहा वरदान

रांची, वरीय संवाददाता। झारखंड में हीमोफीलिया के मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, राज्य में लगभग 1050 लोग इस आनुवंशिक बीमारी (जेनेटिक डिसऑर्डर) की चपेट में हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें शरीर में रक्त के थक्के बनने की प्रक्रिया बाधित होती है। इस बीमारी से पीड़ित मरीजों की संख्या को दो वर्गों में बांटा गया है। ‘हीमोफीलिया ए’ में करीब 900 और ‘हीमोफीलिया बी’ से 150 मरीज प्रभावित हैं। यह मुख्यतः एक आनुवंशिक बीमारी है, लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि 25% मामलों में कोई जेनेटिक इतिहास नहीं पाया जाता, जो बदलती जीवनशैली या नए म्यूटेशन का संकेत माना जा सकता है।

बता दें कि विश्व हीमोफीलिया दिवस हर वर्ष 17 अप्रैल को हीमोफीलिया और अन्य आनुवंशिक रक्तस्राव विकारों के बारे में जागरुकता बढ़ाने के उद्देश्य से मनाया जाता है।इस समस्या से पीड़ित बच्चों को हर हफ्ते दो से तीन बार फैक्टर देना होता है। लेकिन रांची सदर अस्पताल में 50 बच्चों को एमिसिजुमैब दवा दी जाती है। यह एक नया मॉलिक्यूल है, जिसे विश्व स्तर पर हीमोफीलिया केयर में बेहतर माना गया है। इसे माह में सिर्फ एक बार ही दिया जाता है। बार-बार मरीजों को फैक्टर देने की जरूरत नहीं पड़ती। इसके अलावा सबसे अधिक मरीजों का फ्लो भी रांची सदर अस्पताल में ही है। यहां बड़ी संख्या में मरीजों को फैक्टर उपलब्ध कराई जाती है। इस केंद्र में रांची के अलावा अन्य जिलों के भी मरीज आते हैं।बेहतर जांच-इलाज के लिए आधुनिक लैब जरूरीडॉ अभिषेक रंजन के अनुसार छोटे बच्चों में यह बीमारी अक्सर तब सामने आती है, जब वे चलना या खेलना शुरू करते हैं। ऐसे समय में जोड़ों में ब्लीडिंग की समस्या दिखाई देती है, जिसे नजरअंदाज करने पर स्थिति गंभीर हो सकती है। गंभीर मामलों में बिना किसी बाहरी चोट के भी लगातार ब्लीडिंग होती रहती है। जबकि मध्यम स्थिति में चोट लगने, कटने या छिलने पर ब्लीडिंग होती है। कई बार शरीर के अंदर इंटरनल ब्लीडिंग भी हो सकती है, जो खतरनाक है।इस तरह बीमारी की होती है पहचानहीमोफीलिया की पहचान पीटीटी जांच के जरिए की जाती है, लेकिन राज्य में इसके लिए विशेषीकृत कॉएगुलेशन लैब की कमी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। फिलहाल झारखंड में इस तरह की अत्याधुनिक जांच सुविधा उपलब्ध नहीं है, जिससे समय पर निदान और इलाज में बाधा आती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि यह बीमारी मुख्य रूप से पुरुष बच्चों में दिखाई देती है, जबकि महिलाएं इसके कैरियर के रूप में होती हैं।बच्चों के लिए प्रोफिलैक्सिस नीति लागू करना जरूरीडॉ अभिषेक ने कहा, हीमोफीलिया के बेहतर प्रबंधन के लिए बच्चों के बीच प्रोफिलैक्सिस रोकथाम आधारित नीति लागू करना बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में झारखंड में अधिकांश जगहों पर ऑन डिमांड इलाज पद्धति ही लागू है, जिसमें मरीज को तभी दवा दी जाती है जब ब्लीडिंग शुरू हो जाती है। यह पद्धति केवल तत्काल राहत देने तक सीमित रहती है, लेकिन लंबे समय में मरीजों के लिए यह पर्याप्त नहीं मानी जाती। उन्होंने बताया कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में प्रोफिलैक्सिस को सबसे प्रभावी उपचार पद्धति माना गया है, जिसमें मरीजों को नियमित अंतराल पर फैक्टर दिया जाता है, ताकि ब्लीडिंग होने से पहले ही उसे रोका जा सके। इससे बच्चों के जोड़ों में होने वाली बार-बार की ब्लीडिंग को रोका जा सकता है और भविष्य में होने वाली स्थायी विकलांगता से बचाव संभव होता है। खासकर छोटे बच्चों के लिए यह पद्धति बेहद लाभकारी मानी जाती है, क्योंकि शुरुआती अवस्था में ही सही उपचार मिलने से उनका शारीरिक विकास सामान्य रूप से हो सकता है।डे-केयर सेंटर भी जरूरीडॉ अभिषेक के अनुसार राज्य के सभी प्रमुख जिलों में डे केयर सेंटर की समुचित व्यवस्था बेहद जरूरी है, जहां हीमोफीलिया मरीजों को समय पर फैक्टर और अन्य जरूरी इलाज आसानी से मिल सके। ऐसे केंद्रों में प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की तैनाती, आवश्यक दवाओं का पर्याप्त भंडारण और आपात स्थिति से निपटने की सुविधा भी होनी चाहिए, ताकि मरीजों को बार-बार बड़े शहरों के अस्पतालों का चक्कर न लगाना पड़े।यदि मरीजों को समय पर सही इलाज, नियमित फैक्टर रिप्लेसमेंट और उचित निगरानी मिलती रहे, तो वे लगभग सामान्य जीवन जी सकते हैं और रोजमर्रा की गतिविधियों में सक्रिय रह सकते हैं। इसके लिए राज्य में मजबूत स्वास्थ्य ढांचे का विकास, विशेष कॉग्युलेशन जांच प्रयोगशालाओं की स्थापना, विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता और दवाओं की निर्बाध सप्लाई सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है। तभी हीमोफीलिया मरीजों के जीवन स्तर में वास्तविक सुधार लाया जा सकेगा।

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