
रिम्स ओपीडी की सूची में 62 दवाएं, 51 मिल ही नहीं रहीं
रांची के रिम्स में उच्च न्यायालय की निगरानी में भी दवाओं की कमी बनी हुई है। ओपीडी में रोजाना लगभग 2000 मरीज आते हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश को दवाएं उपलब्ध नहीं हो रही हैं। प्रबंधन का दावा है कि 700 दवाएं मुफ्त में दी जा रही हैं, लेकिन मरीजों को बाहर से दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं।
रांची, हिन्दुस्तान ब्यूरो। रिम्स पर इन दिनों झारखंड उच्च न्यायालय की पैनी नजर है। बावजूद इसके व्यवस्था में सुधार नहीं हो पा रहा है। हालात ऐसे हैं कि रिम्स के ओपीडी में हर दिन लगभग 2000 मरीज आ रहे हैं, लेकिन इनमें अधिकांश को एक भी दवा रिम्स प्रबंधन उपलब्ध नहीं करा रहा है। डिस्पेंसरी में दवाएं उपलब्ध ही नहीं के चलते ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो ओपीडी डिस्पेंसरी की सूची (11 दिसंबर 2025) पर मरीजों को उपलब्ध करायी जाने वाली 62 दवाओं के नाम लिखे गए हैं। लेकिन इनमें से 51 दवा ऐसी है, जो यहां उपलब्ध ही नहीं है।

कैटेगरी अनुसार बात करें तो 62 दवाओं की सूची में 36 दवाओं के टैबलेट, 18 के सिरप, सैचे, ड्रॉप्स ओर 8 दवाओं के आइंटमेंट, आई ड्रॉप व ईयर ड्रॉप शामिल हैं। वहीं, उपलब्ध दवाओं में 7 प्रकार के टैबलेट, 3 सिरप, एक माउथ वॉश उपलब्ध है, जबकि एक भी आइंटमेंट, आई ड्रॉप व ईयर ड्रॉप उपलब्ध नहीं है। इनडोर की भी ऐसी ही स्थिति है। मरीज को लिखी गयी अधिकांश दवाएं परिजन बाहर से खरीदकर लाते हैं। हद तो यह है कि गैस, दर्द निवारक व उल्टी आदि की सस्ती दवाएं पैन-40, ट्रॉमाडोल व ओंडम आदि इंजेक्शन भी मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं। हालांकि प्रबंधन का दावा है कि रिम्स में 700 से अधिक दवाएं, मरीजों को नि:शुल्क उपलब्ध करायी जा रही है। ओपीडी ब्लॉक और इमरजेंसी के बीच खड़ी कर दी दीवार प्रबंधन की दूरदर्शिता कहें या नासमझी रिम्स के ओपीडी ब्लॉक (पुरानी बिल्डिंग) से इमरजेंसी व ट्रॉमा सेंटर जाने वाली सड़क पर मंदिर के पास दीवार खड़ी कर दी गई है। रिम्स के चिकित्सक ही इसे गलत बता रहे हैं। ओपीडी में पहुंचे गंभीर मरीज की स्थिति यदि अचानक खराब होती है तो उसे इमरजेंसी तक ले जाने में ही नुकसान हो सकता है। प्रबंधकीय लापरवाही की बात करें तो रिम्स के विभिन्न वार्डों में बाथरूम के दरवाजे नहीं हैं। कुछ वार्ड के तो सभी बाथरूम दरवाजा विहीन है। जिसके कारण मरीज व परिजनों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उसमें मामलू खर्च कर दरवाजा ठीक किया जा सकता है। लेकिन प्रबंधन रिम्स में परिसर में गेट पर गेट बना रहा है। ओपीडी ओर इमरजेंसी के बीच जहां बाउंड्री दी गयी है, उसके बाहर बड़े क्षेत्र में पार्किंग चलाई जा रही है। बाउंड्री तोड़कर दुकानें चलाई जा रही है। लेकिन उसे दुरूस्त करने की बजाए नयी नयी बाउंड्री खींची जा रही है। हद तो तब हो गयी जब चारो तरफ रास्ता होने के बावजूद बाउंड्री पर कंटीली तार के फैंसिंग लगाए जा रहे हैं। पुरानी इमरजेंसी के बाहर पार्क के गेट 24 घंटे खुले रहते हैं, लेकिन उसकी दीवाल पर कंटीली फैंसिंग है, उसके बाद दी गयी बाउंड्री पर भी कंटीली फैंसिंग की गयी है। डॉक्टरों का कहना है कि अस्पताल में मरीजों की सुविधा से ज्यादा बाहरी आडंबर पर अनावश्यक खर्च कर धन की बर्बादी की जा रही है। डॉक्टरों का कहना है कि गेट यदि उतना ही जरूरी है तो हॉस्टल परिसर में कई गेट तो लगा दिए गए लेकिन वह कभी बंद नहीं होता। सभी अनुपयोगी है। विभागाध्यक्षों के साथ मीटिंग हुई है। एसेंशियल ड्रग्स की लिस्ट बनायी जा रही है। स्टोर का वेरिफिकेशन भी किया जा रहा है। जल्द ही मरीजों को दवाएं उपलब्ध होंगी। जिन दवाओं के रेट कांट्रैक्ट है, वह उपलब्ध करायी जा रही है। - प्रो. डॉ हीरेंद्र बिरुआ, अधीक्षक, रिम्स

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