कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न कानून की मजबूती पर एनयूएसआरएल में मंथन

Newswrap हिन्दुस्तान, रांची
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रांची में एनयूएसआरएल ने एनडब्ल्यूसी की मदद से कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न अधिनियम पर क्षेत्रीय विधि समीक्षा परामर्श आयोजित किया। कार्यक्रम में न्यायमूर्ति अंबुज नाथ ने संस्थागत अनुपालन की जरूरत पर जोर दिया, जबकि एसपी प्रवीण पुष्कर ने जागरूकता और शिकायत तंत्र को सुलभ बनाने की बात की।

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न कानून की मजबूती पर एनयूएसआरएल में मंथन

रांची, विशेष संवाददाता। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ स्ट्डी एंड रिसर्च इन लॉ (एनयूएसआरएल) रांची ने राष्ट्रीय महिला आयोग (एनडब्ल्यूसी) नई दिल्ली की मदद से शुक्रवार को क्षेत्रीय विधि समीक्षा परामर्श (पूर्वी क्षेत्र) का आयोजन हुआ। यह आयोजन ‘कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध एवं प्रतितोष) अधिनियम, 2013’ विषय पर आधारित था। इसमें मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अंबुज नाथ, पूर्व न्यायाधीश, झारखंड हाईकोर्ट ने पॉश ढांचे के सख्त संस्थागत अनुपालन व जांच प्रक्रियाओं में प्रक्रियात्मक निष्पक्षता की जरूरत पर जोर दिया। विशिष्ट अतिथि प्रवीण पुष्कर ग्रामीण एसपी ने जागरुकता बढ़ाने और शिकायत तंत्र को अधिक सुलभ बनाने पर जोर दिया। कहा कि कार्यस्थल पर जब कोई नया कर्मचारी आता है तो उसे इंटरनल कंप्लेट कमेटी के सदस्यों से मिलाया जाना चाहिए।

उन्होंने कानून के दुरुपयोग के लेकर भी बात की।एनसीडब्ल्यू के प्रतिनिधि और वरिष्ठ वकील पल्लव पाल ने विभिन्न क्षेत्रों में पॉश अधिनियम के क्रियान्वयन की समीक्षा, प्रणालीगत कमियों की पहचान और परामर्श प्रक्रिया के माध्यम से संस्थागत जवाबदेही को सुदृढ़ करने के आयोग के प्रयासों पर जानकारीदी। वहीं, कार्यक्रम समन्वयक डॉ जूलियन सील पसारी ने परामर्श के उद्देश्यों का ब्योरा पेश किया।परामर्श में पूर्वी व उत्तर-पूर्वी राज्यों- झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में पॉश अधिनियम के क्रियान्वयन का क्षेत्रीय आकलन किया गया। विचार-विमर्श में आंतरिक व स्थानीय समितियों के कार्य, जांच प्रक्रियाओं में आनेवाली चुनौतियां, अधिकार-क्षेत्र संबंधी अस्पष्टताएं व डिजिटल, गिग और हाइब्रिड कार्य परिवेश से उत्पन्न नई समस्याओं पर चर्चा की गई।प्रतिभागियों ने विशेष रूप से असंगठित व अनौपचारिक क्षेत्रों में क्रियान्वयन की कमियों की ओर ध्यान आकर्षित किया, जहां जागरूकता की कमी, सामाजिक कलंक और संस्थागत बाधाएं प्रभावी समाधान तक पहुंच में अवरोध उत्पन्न करती हैं। चर्चाओं में बदलते कार्यस्थल परिदृश्य के अनुरूप विधिक प्रावधानों की पुनर्समीक्षा की आवश्यकता पर भी बल दिया गया, विशेषकर साइबर आधारित उत्पीड़न और डिजिटल साक्ष्य से संबंधित चुनौतियों के संदर्भ में।इस परामर्श में पूर्वी व उत्तर-पूर्वी राज्यों के विविध हितधारकों ने ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से भागीदारी की। विचार-विमर्श को न्यायपालिका, शिक्षाविदों, विधि विशेषज्ञों, लोक प्रशासन, कॉर्पोरेट क्षेत्र और चिकित्सा व फॉरेंसिक विज्ञान, समाजशास्त्र और विधि जैसे अंतर्विषयक क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने समृद्ध किया। प्रतिभागियों में गैर-सरकारी संगठनों, आश्रय गृहों, कॉर्पोरेट फाउंडेशन तथा राज्य महिला आयोगों के प्रतिनिधि शामिल थे, जिन्होंने जमीनी और संस्थागत दोनों दृष्टिकोण प्रस्तुत किए।कार्यक्रम का समापन प्रमुख प्रस्तावों को अपनाने के साथ हुआ, जो पॉश अधिनियम के क्रियान्वयन में पहचानी गई कमियों को दूर करने के उद्देश्य से तैयार किए गए हैं। ये प्रस्ताव राष्ट्रीय महिला आयोग की विधि सुधार प्रक्रिया में सहायक होंगे और कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संबंधित विधिक और संस्थागत ढांचे को सुदृढ़ करने के लिए प्रावधान-विशिष्ट सिफारिशों का आधार प्रदान करेंगे।

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