सीयूजे में समग्र शिक्षा की दिशा में पंचकोश मॉडल पर मंथन

Newswrap हिन्दुस्तान, रांची
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रांची में केंद्रीय विश्वविद्यालय, झारखंड ने 'समग्र मानव विकास के लिए पंचकोश की प्रासंगिकता' पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी की शुरुआत की। शिक्षाविदों ने भारतीय शिक्षा परंपरा की समृद्धि और वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों पर चर्चा की। मुख्य वक्ता प्रो. सरोज शर्मा ने भारतीय ज्ञान की बहुआयामीता और संतुलित विकास पर जोर दिया।

सीयूजे में समग्र शिक्षा की दिशा में पंचकोश मॉडल पर मंथन

रांची, विशेष संवाददाता। केंद्रीय विश्वविद्यालय, झारखंड (सीयूजे) के शिक्षा विभाग की ओर से ‘वर्तमान परिप्रेक्ष्य में समग्र मानव विकास के लिए पंचकोश की प्रासंगिकता’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी की शुरुआत सोमवार को हुई। इसमें देशभर से आए शिक्षाविदों, विशेषज्ञों और शोधार्थियों ने हिस्सा लिया। मुख्य अतिथि विद्या भारती उच्च शिक्षा संस्थान के संगठन सचिव केएन रघुनंदन ने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों पर कहा कि प्रारंभिक स्तर पर समग्र विकास की अनदेखी हो रही है, जबकि यही अवस्था बच्चों की बुनियाद तय करती है। उन्होंने सुझाव दिया कि पंचकोश के सिद्धांतों को प्रारंभिक और प्राथमिक शिक्षा से ही लागू किया जाए, ताकि संतुलित विकास सुनिश्चित हो सके।

मुख्य वक्ता रांची विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो सरोज शर्मा ने भारतीय शिक्षा परंपरा की समृद्धि पर चर्चा करते हुए 64 कलाओं और 18 विद्याओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आज जब विश्व समग्र शिक्षा की ओर बढ़ रहा है, तब भारत का पारंपरिक ज्ञान एक प्रभावी विकल्प प्रस्तुत करता है। कहा कि प्राचीन भारत में शिक्षा बहुआयामी थी, जिसमें कला, विज्ञान, दर्शन और जीवन कौशल का समन्वय था। उन्होंने ऋग्वेद के संदर्भों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय चिंतन मानव और ब्रह्मांड के बीच गहरे संबंध को समझने पर आधारित रहा है। आज जब पूरी दुनिया समग्र शिक्षा की ओर बढ़ रही है, तब भारत की परंपरागत शिक्षा प्रणाली एक मजबूत वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत कर सकती है।सीयूजे के कुलपति प्रो. सारंग मेधेकर ने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि चेतना, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का विकास करना है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता पर जोर देते हुए कहा कि यह परंपरा आज के आधुनिक और तकनीकी युग में भी उतनी ही उपयोगी है, क्योंकि यह मनुष्य को भीतर से विकसित करने पर बल देती है।इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर टीचर एजुकेशन के निदेशक प्रेम नारायण सिंह ने शिक्षा नीति निर्माण में शिक्षकों की सीमित भागीदारी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि शिक्षा को समयानुकूल बनाने के साथ उसके मूल्यों को बनाए रखना भी आवश्यक है, ताकि विद्यार्थी जीवन के यथार्थ से जुड़ सकें। विद्या भारती के सचिव ब्रह्माजी राव ने शिक्षा के भारतीयकरण की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाना समय की मांग है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी शिक्षा से उपयोगी तत्व अपनाते हुए भी सांस्कृतिक मूल्यों को बनाए रखना जरूरी है।सीयूजे के शिक्षा संकाय के डीन प्रो तपन कुमार बसंतिया ने पंचकोश को भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिक और दार्शनिक अवधारणा बताते हुए कहा कि यह शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास का संतुलित मॉडल प्रस्तुत करता है। वहीं, शिक्षा विभागाध्यक्ष प्रो विमल किशोर ने नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क (एनसीएफ)-2023 और पंचकोश के बीच संबंधों को रेखांकित करते हुए कहा कि नई शिक्षा नीति अनुभवात्मक, मूल्यपरक और समग्र शिक्षा पर जोर देती है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्राध्यापकों सहित शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने हिस्सा लिया।

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