वेद-वेदांग में भारतीय ज्ञान परंपरा का स्वरूप है: स्वामी परिपूर्णानंद
रांची विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग और पूर्ववर्ती छात्रसंघ द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय शोध-संगोष्ठी का समापन शनिवार को हुआ। मुख्य अतिथि स्वामी परिपूर्णानंद ने भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व पर जोर दिया। 120 से अधिक शोध पत्र प्रस्तुत किए गए और उत्कृष्ट शोध के लिए पुरस्कार भी दिए गए।

रांची, विशेष संवाददाता। रांची विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग और पूर्ववर्ती छात्रसंघ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय शोध-संगोष्ठी का शनिवार को समापन हो गया। समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में चिन्मय मिशन के स्वामी परिपूर्णानंद सरस्वती उपस्थित थे, जबकि कार्यक्रम की अध्यक्षता सरला बिरला विश्वविद्यालय की प्रो. नीलिमा पाठक (अध्यक्ष, योग एवं नैचुरोपैथी और आर्ट, कल्चर एंड स्पोर्ट संकाय) ने की। स्वामी परिपूर्णानंद सरस्वती ने वेद-वेदांग में सन्निहित भारतीय ज्ञान परंपरा के वास्तविक स्वरूप को आत्मसात करने की प्रेरणा दी। कहा कि संस्कृत को केवल रोजगार के साधन तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इसे जीवन दर्शन के रूप में अपनाना चाहिए।
वहीं, प्रो. नीलिमा पाठक ने ज्ञान-विज्ञान की पारंपरिक विद्या को गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ाने पर बल दिया। कार्यक्रम की शुरुआत में पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. मधुलिका वर्मा ने वैदिक श्लोक का पाठ किया।विश्वविद्यालय के डीएसडब्ल्यू प्रो. सुदेश कुमार साहू ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी के युवाओं का यह उत्तरदायित्व है कि वे लुप्त हो रही भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित कर समाज के कल्याण के लिए सामने लाएं। रजिस्ट्रार डॉ. गुरुचरण साहू ने भी इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि ऐसी संगोष्ठियों के माध्यम से ही प्राचीन ज्ञान जन-जन तक पहुंच सकता है।इस दो दिवसीय संगोष्ठी में देश भर से आए विद्वानों द्वारा 120 से अधिक शोध पत्र पढ़े गए। उत्कृष्ट शोध के लिए डॉ. रजनी गोस्वामी, डॉ. पारंगत खलखो, डॉ. जीतेश पासवान और उदय कर्मकार को प्रो. अयोध्या प्रसाद सिंह स्मृति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में डॉ. मीना शुक्ल, अरुण बसंत, डॉ. मीरा सिंह, डॉ. जानकी देवी सहित कई विभागाध्यक्ष, शिक्षक और बड़ी संख्या में शोधार्थी उपस्थित थे। पूरे कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. राहुल कुमार ने किया।
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