कुरमी को एसटी का दर्जा देने के विरोध में प्रतिकार रैली में उमड़ा जनसैलाब
संक्षेप: खूंटी में आदिवासी समन्वय समिति के आह्वान पर एक विशाल प्रतिकार आक्रोश रैली का आयोजन किया गया। रैली में आदिवासी समुदाय ने कुरमी को आदिवासी दर्जा देने के खिलाफ नारेबाजी की। वक्ताओं ने कुरमी समाज की मांग...

खूंटी, संवाददाता। आदिवासी समन्वय समिति एवं समस्त आदिवासी सामाजिक संगठनों के आह्वान पर मंगलवार को खूंटी के कचहरी मैदान से विशाल प्रतिकार आक्रोश रैली निकाली गई। रैली कचहरी मैदान से शुरू होकर बाजारटांड़, भगत सिंह चौक, नेताजी चौक, दतिया रोड, डाकबंगला रोड होते पुनः बाजारटांड़ और कचहरी मैदान पहुंचकर समापन हुआ। प्रतिकार रैली में जिलेभर से विभिन्न आदिवासी संगठन और हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए। रैली में आदिवासी समुदाय के लोगों ने कुरमी को आदिवासी का दर्जा दिए जाने के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और किसी भी सूरत में सरकार के इस फैसले को नहीं मानने को लेकर आवाज बुलंद किया।
इसके पूर्व कचहरी मैदान में चंद्र प्रभात मुंडा के नेतृत्व में विशाल सभा का आयोजन किया गया। सभा में पड़ाह राजा सोमा मुंडा, मार्शल बरला, अलेस्टर बोदरा, सनिका भेंगरा, बिरतूस ओड़ेया, जैक जॉन हमसोय, ग्लैडसन डुंगडुंग, ज्योत्सना केरकेट्टा समेत अनेक वक्ताओं ने झारखंड के कुर्मी, कुड़मी समाज द्वारा आदिवासी दर्जे की मांग को फर्जी इतिहास, तथ्यविहीन दस्तावेज़ और असंगत तर्क पर आधारित बताया। इस दौरान कुर्मी समाज पर बाहरी पूंजीपतियों और राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित बताया गया। सभा को संबोधित करते हुए महाराष्ट्र से आए प्रेम गेंडाम ने कहा कि 1965 की लुकुर कमेटी की रिपोर्ट में झारखंड के कुड़मी समाज को कहीं भी एसटी श्रेणी में फिट नहीं बताया गया है, न ही उनका डीएनए आदिवासियों से मेल खाता है। वहीं लेखक व सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग ने ऐतिहासिक जनगणना और दस्तावेज़ों का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी अभिलेख में कुर्मी समुदाय को आदिवासी नहीं माना गया है। मौके पर झारखंड उलगुलान संघ के अध्यक्ष एलेस्टर बोदरा ने कहा कि जब लोकर कमेटी ने 1965 में मानदंड तैयार करके स्पष्ट कर दिया कि अनुसूचित जनजाति में सूचीकरण एवं पहचान बनाएं बनाने के लिए आदिम लक्षण विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, सामाजिक दूरी तथा आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का अहर्ता पूरा करता है। वहीं आदिवासी में सूचीबद्ध हो सकता है। उन्होंने कहा कि कुर्मियों को जनजातीय शोध संसाधन ने अस्वीकार कर दिया है। कोलकाता उच्च न्यायालय ने भी खारिज कर चुका था। राष्ट्रीय महानिबंधक ने भी कुरमी की मांग को खारिज कर दिया। तो भी कुर्मी समाज द्वारा आदिवासी सूची में सूचीबद्ध होने को लेकर आंदोलन करना कहीं ना कहीं एक षड्यंत्र मालूम पड़ता है जो झारखंडी एकता को तोड़कर राजनीति फायदा उठाना चाहता है तथा यहां के जमीन, जंगल पर कब्जा करने करना चाह रहा है। उन्होंने 11 यह शोषण वर्ग और पूंजीपतियों का साजिश है। इस साजिश को आदिवासी समाज कभी पूरा नहीं होने देगा। सभा को संबोधित करते हुए अध्यक्ष चन्द्र प्रभात मुंडा ने कहा कि राजनीतिक लाभ के लिए कुर्मी समाज के कुछ तथाकथित नेता झारखंड की सामाजिक एकता को भंग करने की कोशिश कर रहे हैं। आज की रैली राज्य में सौहार्द बहाली का प्रतीक है। कार्यक्रम में तिडू पड़हा राजा मंगल मुंडा, जॉन जुनास तिडू, सूरजु हस्सा, महेंद्र मुंडा, विजय संगा, भोला पाहन, बा सिंह मुंडा, भीमसेन कैथा, हेमंत तोपनो सहित खूंटी जिले के विभिन्न गांवों के ग्राम प्रधान, मुंडा-पाहन और हजारों की संख्या में युवा-युवतियों महिला पुरुषों ने हिस्सा लिया।

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