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5 अगस्त, 2020|10:18|IST

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बकरीद पर भी मदरसों को होगा लाखों का नुकसान

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दईद उल अजहा (बकरीद) मुसलमानों का मुख्य त्योहारों में से एक है। एक अगस्त को बकरीद मनायी जाएगी, लेकिन कोरोना के बढ़ते मामले और ऑनलॉक के बीच बकरीद की नमाज और कुर्बानी को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। मस्जिदों व ईदगाहों में ईद उल अजहा की नमाज अदा होगी या नहीं, इस पर अबतक सरकार की ओर से कोई दिशा-निर्देश नहीं आया है। यहां तक कि सरकार ने सामूहिक कुर्बानी को लेकर भी कोई गाइडलाइन जारी नहीं किया है। दूसरे राज्यों से छोटे व बड़े जानवर नहीं आने की वजह से इस बार कुर्बानी भी कम होगी। इसका असर मदरसों के संचालन पर पड़ेगा। कोरोना और लॉकडाउन की वजह से जानवर के चमड़े की कीमत भी आधी से भी कम हो चुकी है। रमजान में पहले ही मदरसों को इमदाद नहीं मिल सकी, अब बकरीद में भी ऐसे ही हालात हैं। ऐसे में मदरसों के संचालन को लेकर प्रबंधन परेशान है।इमदाद से चलने वाले हैं एक सौ मदरसेरांची में छोटे व बड़े लगभग सौ मदरसे हैं। मदरसा बाहर से आए छात्रों की शिक्षा के साथ ठहरने और खाने की व्यवस्था भी प्रबंधन करता है। बड़े मदरसों में प्रतिवर्ष लाखों रुपये खर्च होते हैं। कई मदरसों का खर्च ही कुर्बानी से निकली खाल को बेच कर होने वाली आय और रमजान में फितरा व जकात की धनराशि से चलता है। सालभर मदरसों के प्रबंधक रमजान और बकरीद का इंतजार करते हैं।मदरसों में होता है जानवर की कुर्बानी का इंतजामरांची के कई मदरसों में तो सामूहिक कुर्बानी का इंतजाम भी किया जाता है। शहर में होने वाली कुर्बानी की खालों को एकत्र करने के लिए कलेक्शन सेंटर बनाए जाते हैं। कुर्बानी से हासिल खालों को टेनरियों में बेच कर मदरसों पर खर्च किया जाता है। लॉकडाउन की वजह से फिलहाल न तो किसी मदरसे में सामूहिक कुर्बानी का इंतजाम हो पा रहा है, न पोस्टर-बैनर के जरिए खाले मदरसों में देने का प्रचार किया जा रहा है। मदरसों को रमजान में पहले ही बहुत कम एक चौथाई ही इमदाद मिल सकी है। कारोबार प्रभावित होने से मदरसों को पहले की तरह चंदा भी नहीं मिल पा रहा है।एक लाख जानवरों की हुई थी कुर्बानीरांची जिले में बकरीद के मौके पर साल 2019 में एक लाख से ज्यादा छोटे-बड़े जानवरों की कुर्बानी हुई थी। उस वक्त एक जानवर के चमड़े की कीमत चार से पांच सौ रुपए निर्धारित थी। इसी हिसाब से चमड़े बिके थे।

कोट :

लॉकडाउन की वजह से बड़े जानवर की खाल की कीमत 300 से घटकर 90-100 रुपये रह गई है तो बकरे की खाल 80 से 10-20 रुपये पर आ गई है। व्यापारी भी नहीं आ रहे हैं, जिससे चमड़ा उद्योग को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है। -जमील कुरैशी, व्यवसायी

ज्यादातर लोग कुर्बानी की खाले मदरसों को दान कर देते हैं। आय के लिए मदरसे भी कुर्बानी कराते हैं। इस वर्ष लॉकडाउन की वजह से असमंजस है। सरकार की तरफ से सामूहिक कुर्बानी को लेकर कोई गाइड लाइन भी जारी नहीं की गई है। कम कुर्बानी का असर मदरसों के संचालन पर पड़ेगा। -मजहर सिद्दिकी, अध्यक्ष इस्लामी मरकज

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  • Web Title:Madrasas will also lose lakhs on Bakrid