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आदिवासियों को असुर बताने वाले करते हैं सरना-सनातन की बात : चंपिया

आदिवासियों को असुर बताने वाले करते हैं सरना-सनातन की बात : चंपिया

आदिवासियों को असुर-राक्षस और जंगली भालू-बंदर की संज्ञा देने वाले अब सरना-सनातन की बात कर रहे है और गले लगा रहे है। यह बाते बिहार विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष देवेंद्र नाथ चंपिया ने कही। वे रविवार को मोरहाबादी में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में बोल रहे थे। आयोजन आदिवासी सरना महासभा और राष्ट्रीय इंडिजिनयस आदिवासी धर्म समन्वय समिति के संयुक्त सहयोग से किया गया था। विषय था, जनगणना प्रपत्र में आदिवासी-अनुसूचित जनजातियों के लिए अलग धर्म कोड-कॉलम की मांग।

देवेंद्र नाथ ने कहा कि संविधान में इसलिए आदिवासी शब्द को हटा दिया गया, क्योंकि बाकी लोग बाहरी हो जाते और आदिवासी मूलवासी। संगोष्ठी में विभिन्न राज्यों के आदिवासी समुदाय के प्रतिनिधि शामिल हुए। इस दौरान आदिवासी धर्म, आदि धर्म, प्रकृति धर्म सहित अन्य नामों पर सहमति पर सचित्र गहन विचार विमर्श किया गया। पूर्व मंत्री सह राष्ट्रीय जनजातीय आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ रामेश्वर उरांव ने कहा कि झारखंड में 86 लाख आदिवासियों में 40 लाख लोग सरना धर्म, 32 लाख हिंदू धर्म और 13 लाख लोग ईसाई धर्म मानते है। केंद्र और राज्य सरकार आदिवासियों को धर्म के नाम पर लड़वा रही है। यदि आदिवासी एक रहे तो ताकतवार रहेंगे और बंटे रहेंगे तो कमजोर रहेंगे। उन्होंने कहा कि सीएनटी-एसपीटी एक्ट के संशोधन के विरोध में हुए आंदोलन में आदिवासी एकजुट हो गए थे, अब इसी आदिवासी एकता को तोड़ने की साजिश की जा रही है। धर्म कोड के लिए पूरे देश के आदिवासियों को एक नाम पर सहमति बनानी होगी। तभी आदिवासियों को अलग से धर्म कोड मिल पाएंगा। महासभा के मुख्य संयोजक देवकुमार धान ने कहा कि आर्य नहीं चाहते थे कि आदिवासी स्थापित हो। इसलिए संविधान से आदिवासी शब्द को हटाकर जनजाति शब्द डाल दिया। मौके पर प्रवीण उरांव, विरेंद्र भगत के अलावा छात्रपति शाही मुंडा, पूर्व सांसद चित्रसेन सिंकू, अभय भुटकुंवर, जुगल किशोर पिंगुवा सहित कई जनजातीय समाज के प्रतिनिधि शामिल थे।

लंबे समय तक आदिवासियों को नहीं मिली है पहचान : डॉ करमा

- अन्य वक्ता के रूप में मानवशास्त्री डॉ करमा उरांव ने कहा कि इस देश के मूल लोग आदिवासी है, परंतु लंबे वर्षो के अंतराल के बाद भी आदिवासियों को पहचान नहीं मिली है। आदिवासियों का धर्म प्राचीनतम है। धर्म कोड नहीं रहने के कारण पश्चिमी सभ्यता को आदिवासियों ने अपना लिया। वहीं दूसरी ओर सरना-सनातन की बात हो रही है। सरना-सनातन, ईसाई, मुस्लिम अलग-अलग धर्म है। परंतु सरना-सनातन कहकर आदिवासियों को गलत तरीके से परिभाषित किया जा रहा है।

गोत्र-टोटम ही आदिवासियों की पहचान : केपी प्रधान

- गोंडवाना धर्माचार्य केपी प्रधान ने कहा कि ट्राइबल का गोत्र-टोटम ही पहचान है, जो जन्म से प्राप्त होता है। कहा कि प्रकृति के तीन आयमों को मानने वालों को ही आदिवासी-ट्राइब कहा जाता है। जिनका मूल आधार ही प्रकृति है और प्रकृतिकवाद ही बड़ा अध्यात्मिक है।

जबरन गुलाम बनाकर अपनी संस्कृति थोपी : हरि सिंह मीणा

- राजस्थान से आए हरि सिंह मीणा ने कहा कि आदिवासी पहचान और स्वाभिमान के लिए तरस रहा है। हमारी सत्ता को आर्यो ने छीना और गुलाम बनाकर अपनी संस्कृति हम आदिवासियों पर थोप दी। कहा कि जब तक शिक्षा के क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ेंगे। अपना अधिकार व पहचान नहीं मिलेगी।

इन राज्यों के प्रतिनिधि हुए शामिल

- बिहार से सत्यनारायण सिंह आयोमा, शिवम कुमार, गुजरात से लालुभाई वसावा, महाराष्ट्र से पीकेटी गावीत, ओड़िसा से धनश्याम मडावी, छत्तीसगढ़ से अरविंद सिंह, यूपी से अरविंद शाह भुरावी, पश्चिम बंगाल से काली शाह मडावी सहित अन्य शामिल हैं।

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  • Web Title:Let the tribals know as a helper, the talk of Sarna-Sanatan: Champia