
झारखंड पवेलियन में हरित नवाचार और सतत विकास का मॉडल प्रदर्शित
दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे 44वें अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले में झारखंड पवेलियन ने हरित अर्थव्यवस्था और सतत विकास के प्रयासों को प्रदर्शित किया। सिसल (एगेव) के उत्पादों का प्रदर्शन हुआ, जो प्राकृतिक फाइबर, बायो-इथेनॉल और स्वच्छ ऊर्जा में उपयोगी हैं। इससे ग्रामीणों के लिए स्थायी आजीविका के अवसर भी उत्पन्न हो रहे हैं।
रांची, हिन्दुस्तान ब्यूरो। दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहे 44वें अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेले (आईआईटीएफ) के छठे दिन बुधवार को झारखंड पवेलियन में हरित अर्थव्यवस्था और सतत विकास की दिशा में किए जा रहे उल्लेखनीय प्रयासों को प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया। वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग द्वारा इस काम को किया गया है। पवेलियन में सिसल (एगेव) आधारित उत्पादों और नवाचारों का प्रदर्शन आगंतुकों को झारखंड की उभरती संभावनाओं से रूबरू करा रहा है। कम पानी और प्रतिकूल मौसम में पनपने वाला यह पौधा प्राकृतिक फाइबर का प्रमुख स्रोत है। इसका उपयोग रस्सी, मैट, बैग और विभिन्न हैंडक्राफ्ट उत्पादों के निर्माण में होता है।
इसके रस से बायो-इथेनॉल और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन की संभावनाएं भी बढ़ रही हैं। वहीं, औषधीय और कॉस्मेटिक उपयोग ने स्थानीय उद्यमिता को नई दिशा दी है। एगेव का बंजर और कम उपजाऊ भूमि पर भी आसानी से उगना इसे भूमि संरक्षण, पारिस्थितिक पुनरुद्धार और जलवायु अनुकूल खेती का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाता है। सिसल परियोजना के एसबीओ अनितेश कुमार ने बताया कि अभी 450 हेक्टेयर क्षेत्र में सिसल की रोपाई हो चुकी है। विभाग का लक्ष्य इस वित्तीय वर्ष में इसे 100 हेक्टेयर और बढ़ाने का है। वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की पहल पर राज्य में बड़े पैमाने पर सिसल की रोपाई कर ग्रामीणों के लिए स्थायी आजीविका के अवसर तैयार किए जा रहे हैं। विभाग हर वर्ष लगभग 90,000 मानव-दिवस का रोजगार सृजित कर रहा है, जो ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिरता और हरित विकास को महत्वपूर्ण गति प्रदान कर रहा है। पवेलियन में प्रदर्शित जूट उत्पाद भी झारखंड की समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा को प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत कर रहे हैं।

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