जैक के दैनिक वेतनकर्मियों के आवेदन पर छह सप्ताह में निर्णय लेने का निर्देश
झारखंड हाईकोर्ट ने जैक में कार्यरत दैनिक वेतनकर्मियों के नियमितीकरण और सेवा लाभों के मामले में सुनवाई की। कर्मचारियों ने 2006 में वॉक-इन-इंटरव्यू के माध्यम से नियुक्ति का दावा किया। अदालत ने जैक सचिव को छह सप्ताह में सभी दावों पर विचार करने का निर्देश दिया।

रांची, विशेष संवाददाता। झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड एकेडमिक काउंसिल (जैक) में वर्षों से कार्यरत दैनिक वेतनकर्मियों के नियमितीकरण और सेवा लाभ से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए प्रार्थियों को सभी प्रासंगिक दस्तावेजों के साथ जैक सचिव को अभ्यावेदन देने और सचिव को छह सप्ताह के अंदर कानून के तहत दावों पर विचार करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने याचिका निष्पादित कर दी। इस संबंध में श्यामल दत्ता समेत 19 कर्मचारियों ने याचिका दायर की थी। प्रार्थियों का कहना था कि वे वर्ष 2006 में जैक के जारी विज्ञापन के तहत वॉक-इन-इंटरव्यू के माध्यम से क्लास-थ्री पदों पर मौसमी दैनिक वेतन पर नियुक्त किए गए थे और तब से निरंतर सेवा दे रहे हैं।
याचिका में मांग की गई थी कि उन्हें नियमित किया जाए। न्यूनतम मूल वेतन, महंगाई भत्ता, आवास भत्ता, चिकित्सा भत्ता, परिवहन भत्ता, भविष्य निधि और सातवें वेतनमान सहित सभी लाभ दिए जाएं। 20 वर्षों की सेवा के बाद भी लाभ से वंचित याचिकाकर्ताओं ने दावा किया कि जैक में इसी तरह नियुक्त 47 दैनिक वेतनकर्मियों, 10 सुरक्षा गार्डों और दो चालकों को पहले ही नियमित कर्मचारियों जैसे लाभ दिए जा चुके हैं। प्रार्थियों ने अदालत को बताया कि उनकी नियुक्ति विज्ञापन और चयन प्रक्रिया के तहत हुई थी और वे पिछले लगभग 20 वर्षों से लगातार कार्य कर रहे हैं। उनका कहना था कि समान स्थिति वाले कर्मचारियों को नियमित कर लाभ दिया गया, जबकि उन्हें इससे वंचित रखा गया, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। जैक ने कहा- नियमितीकरण का स्वत: अधिकारी नहीं बनता जैक की ओर से बताया गया कि याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति स्वीकृत और रिक्त पदों पर नहीं थी, बल्कि वे दैनिक वेतन/संविदा आधार पर कार्यरत थे, इसलिए नियमितीकरण का स्वतः अधिकार नहीं बनता। इसके समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला भी दिया गया। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि याचिकाकर्ता करीब दो दशकों से कार्यरत हैं और उनका कार्य स्थायी प्रकृति का प्रतीत होता है। कोर्ट ने कहा कि यदि अभ्यावेदन पर विचार के बाद याचिकाकर्ता किसी लाभ के हकदार पाए जाते हैं, तो उनके नियमितीकरण और अन्य सेवा लाभों पर चार सप्ताह के भीतर विचार किया जाए। किसी भी दावे को अस्वीकार करने की स्थिति में कारणयुक्त आदेश जारी करना अनिवार्य होगा।
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