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अब बिना कीड़ों को मारे तैयार होगा रेशम

अब बिना कीड़ों को मारे तैयार होगा रेशम

संक्षेप:

रांची, संवाददाता। आईआईटी बॉम्बे की 'जीवोदया' परियोजना ने नैतिक रेशम उत्पादन में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है। इस तकनीक में रेशम के कीड़ों को मारने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे वे अपने प्राकृतिक जीवन चक्र को पूरा कर सकते हैं। यह परियोजना पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने में सहायक होगी।

Feb 01, 2026 09:32 pm ISTNewswrap हिन्दुस्तान, रांची
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रांची, संवाददाता। कोल इंडिया के कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) फंड के सहयोग से संचालित आईआईटी बॉम्बे की पायलट परियोजना ‘जीवोदया’ ने तीन वर्षों के अनुसंधान और विकास के बाद नैतिक रेशम उत्पादन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इस परियोजना के तहत आईआईटी बॉम्बे के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए प्रौद्योगिकी विकल्प केंद्र (सी-तारा) ने रेशम उत्पादन की ऐसी अभिनव तकनीक विकसित की है, जिसमें रेशम के कीड़ों को मारने की आवश्यकता नहीं होती। पारंपरिक विधि से अलग, इस तकनीक में रेशम के कीड़े रेशमी धागा उत्पन्न करने के बाद पतंगे (मॉथ) में परिवर्तित होकर अपना प्राकृतिक जीवन चक्र पूरा कर पाते हैं।

मानवीय और नैतिक दृष्टिकोण को दर्शाते हुए इस रेशम को ‘जीवोदया सिल्क’ नाम दिया गया है। परंपरागत रूप से कैसे अलग परंपरागत रूप से शहतूत की पत्तियों पर पलने वाले रेशम के कीड़े अपने चारों ओर कोकून बनाते हैं और रेशम निकालने के लिए इन कोकूनों को उबाल दिया जाता है, जिससे लाखों कीड़ों की मृत्यु हो जाती है। ‘जीवोदया’ परियोजना ने इस प्रथा को चुनौती देते हुए करुणा-आधारित वैज्ञानिक नवाचार से रेशम उत्पादन प्रक्रिया को नई दिशा दी है। लंबे प्रयोगों के बाद सी-तारा ने ऐसी तकनीक विकसित की, जिसमें रेशम के कीड़ों को कोकून बनाए बिना समतल सतह पर रेशमी धागा बुनने के लिए अनुकूलित किया गया। इससे कीड़ों को कोकून बनाने की जरूरत नहीं रहती और वे बाद में पतंगे के रूप में विकसित होकर उड़ सकते हैं। यह उपलब्धि नैतिकता, पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक नवाचार का उदाहरण है। साथ ही, यह तकनीक रेशम उत्पादन से जुड़े किसानों के लिए आय का नया और सतत स्रोत बन सकती है, जिससे ग्रामीण आजीविका को भी मजबूती मिलेगी। इस पहल को अवधारणा से सफलता तक पहुंचाने में कोल इंडिया का सीएसआर सहयोग महत्वपूर्ण रहा है।

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