बोले रांची: गैस ने छीनी नींद, कोयले ने सुबह 4 बजे से चैन

Newswrap हिन्दुस्तान, रांची

रांची में गैस की आपूर्ति ठप होने से मेस संचालकों और कारीगरों की दिनचर्या प्रभावित हुई है। अब उन्हें सुबह चार बजे काम शुरू करना पड़ रहा है, जिससे नींद पूरी नहीं हो पा रही है। कोयले और लकड़ी पर निर्भरता बढ़ गई है, जिससे स्वास्थ्य समस्याएं और काम की गुणवत्ता पर असर पड़ रहा है।

बोले रांची: गैस ने छीनी नींद, कोयले ने सुबह 4 बजे से चैन

रांची, संवाददाता। राजधानी में व्यावसायिक गैस की आपूर्ति ठप होने का असर अब मेस संचालकों और कारीगरों पर साफ दिखने लगा है। हिन्दुस्तान के ‘बोले रांची’ कार्यक्रम में शहर के विभिन्न छात्रावासों और मेस से जुड़े कारीगरों ने अपनी समस्याएं खुलकर रखीं। बताया कि गैस की किल्लत से उनका काम न सिर्फ कठिन हो गया है, बल्कि उनकी दिनचर्या बदल गई है। पहले वे सुबह छह बजे काम शुरू करते थे, अब चार बजे ही उठकर काम पर लगना पड़ रहा है। कोयला और लकड़ी का ही सहारा है, जिससे काम का समय और मेहनत दोनों बढ़ गए हैं। धुएं से स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी हैं।

छात्र-छात्राओं को हर दिन के मेनू के हिसाब से भोजन देना पड़ता है। लेकिन, पालन नहीं कर पा रहा है। कई जगहों पर छात्रों को सुबह का नाश्ता तक उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।रांची में गैस आपूर्ति की कमी ने मेस कारीगरों की जिंदगी को काफी हद तक प्रभावित कर दिया है। हिन्दुस्तान के ‘बोले रांची’ कार्यक्रम में कारीगरों ने बताया कि पहले की तुलना में अब उन्हें अधिक समय और मेहनत करनी पड़ रही है। पहले सुबह छह बजे काम शुरू होता था, अब उन्हें चार बजे से ही काम में लगना पड़ता है, ताकि समय पर भोजन तैयार किया जा सके। कारीगरों के अनुसार, गैस की कमी के कारण खाना बनाने की पूरी प्रक्रिया प्रभावित हो गई है। कोयले या लकड़ी की भट्टी का उपयोग कर रहे गैस सिलेंडर समय पर नहीं मिलने के कारण कई मेस संचालक कोयले या लकड़ी की भट्टी का उपयोग कर रहे हैं। इससे खाना बनाने में समय अधिक लग रहा है और काम की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है। भट्टी से निकलने वाला धुआं कारीगरों के लिए एक बड़ी समस्या बन गई है। लगातार धुएं में काम करने से आंखों में जलन जैसी समस्याएं भी हो रही हैं। कई कारीगरों ने बताया कि लंबे समय तक ऐसे वातावरण में काम करना उनके स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। इसके अलावा, कोयले पर खाना बनाने से बर्तन भी अधिक गंदे हो जाते हैं। कालिख जमने के कारण बर्तन साफ करने में पहले से कहीं ज्यादा समय और मेहनत लगती है। इससे काम का बोझ और बढ़ जाता है और कारीगरों को देर तक काम करना पड़ रहा है। गैस की कमी का असर मेस के मेन्यू पर भी साफ नजर आ रहा है। व्यंजन बनाना काफी मुश्किलकारीगरों ने बताया कि वे किसी तरह रोटी और चावल जैसे सामान्य भोजन तो तैयार कर पा रहे हैं, लेकिन पराठा, पूड़ी और अन्य व्यंजन बनाना काफी मुश्किल हो गया है। इन व्यंजनों के लिए अधिक और नियंत्रित गैस की जरूरत होती है, जो फिलहाल उपलब्ध नहीं है। कई मेस संचालकों ने बताया कि सुबह के समय गैस उपलब्ध नहीं होने के कारण वे छात्रों को नाश्ता नहीं दे पा रहे हैं। इससे छात्रों की दिनचर्या भी प्रभावित हो रही है। कारीगरों और मेस संचालकों ने प्रशासन से मांग की है कि मेस और होटल व्यवसाय को प्राथमिकता के आधार पर गैस की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए। उनका कहना है कि यह सिर्फ उनके रोजगार का ही नहीं, बल्कि हजारों छात्रों के भोजन और स्वास्थ्य का भी मामला है। यदि जल्द ही इस समस्या का समाधान नहीं किया गया, तो मेस संचालन प्रभावित होगा और कई जगहों पर बंद होने की नौबत भी आ सकती है, जिससे स्थिति और गंभीर हो सकती है।काम का समय बढ़ा, नींद पूरी नहीं गैस संकट ने कारीगरों के जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे उनका काम करने का समय बढ़ गया है और उन्हें नींद पूरी करने का मौका नहीं मिल रहा है। पहले से दो घंटे पहले, यानी सुबह लगभग चार बजे, काम शुरू करने की मजबूरी ने उनकी पूरी दिनचर्या को अस्त-व्यस्त कर दिया है। इतनी जल्दी उठकर काम शुरू करने से उनकी नींद पूरी नहीं हो पा रही है। कहा कि बर्तन में मिट्टी के लेप और कालिख लगे होते हैं। हर दिन राख निकालने और निस्तारण के लिए उसको अलग से रखना भी बड़ी समस्या बन गई है। इससे कारीगरों के जीवन के स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी बढ़ा दी हैं। अपर्याप्त नींद का सीधा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। कई बार थकान के कारण चिड़चिड़ापन और एकाग्रता में कमी जैसी समस्याएं महसूस हो रही है, जिसका सीधा असर काम की गुणवत्ता पर भी पड़ रहा है। कम नींद के कारण कारीगरों की कार्यक्षमता घट रही है। उन्होंने कहा कि इससे उत्पादन धीमा हो सकता है और तैयार उत्पादों में त्रुटियों की आशंका बढ़ सकती है। यह गैस संकट न केवल एक आर्थिक समस्या है। बल्कि इससे कारीगरों की शारीरिक थकान भी बढ़ी है। इसके लिए तत्काल समाधान की आवश्यकता है, ताकि वे स्वस्थ जीवन जी सकें।समस्याएं1. गैस की आपूर्ति बंद होने के बाद से सुबह जल्दी उठना पड़ रहा है, जिससे नींद पूरी नहीं हो पा रही है2. पहले छह बजे से काम शुरू करते थे। लेकिन, अब कोयला भट्टी जलाने के लिए सुबह चार बजे से ही काम पर लगना पड़ता है3. धुएं से आंखों में जलन समेत कई परेशानियां होती हैं। लेकिन, एलपीजी संकट में इसपर ही सारा काम करना पड़ रहा है4. अधिक आंच से मेन्यू के हिसाब से खाना नहीं बना पा रहे हैं। मेन्यू में पराठा है, पर रोटी ही देना पड़ रहा है।5. कई बार चूल्हा नहीं जलने से छात्रों को नाश्ता नहीं दे पाते हैं।सुझाव1. मेस के लिए प्राथमिकता पर गैस की आपूर्ति शुरू हो, ताकि हमलोगों को सुबह जल्दी नहीं उठना पड़े।2. मेस संचालकों को राशनिंग कर भी सिलेंडर की आपूर्ति की जाए, ताकि वैक्लपिक ईंधन पर सभी कामों के लिए निर्भरता कम हो। 3. सभी इलाकों में वैकल्पिक ईंधन पीएनजी की सुविधा उपलब्ध करायी जाय, जिससे एलपीजी पर निर्भरता कम हो।4. एलपीजी की आपूर्ति के साथ पीएनजी पाइपलाइन बिछाई जाए, ताकि कोयले का विकल्प भी मिले।5. प्रशासनिक निगरानी और आपूर्ति नियंत्रण करें, जिससे जल्द से जल्द यह समस्या दूर हो।रखीं बातेंगैस संकट ने हमारी पूरी दिनचर्या बदल दी है। पहले हम आराम से काम करते थे, लेकिन अब सुबह चार बजे से काम शुरू करना पड़ता है। कोयले की भट्टी पर खाना बनाना मुश्किल है और धुएं से सांस लेने में दिक्कत होती है। इससे हमारी सेहत पर भी असर पड़ रहा है और काम की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है- दिवाकर , कारीगरगैस नहीं मिलने से मेस चलाना बहुत कठिन हो गया है। छात्रों को समय पर खाना देना चुनौती बन गई है। खासकर सुबह का नाश्ता नहीं दे पा रहे हैं। कोयले पर काम करने से समय ज्यादा लगता है और बर्तन भी बहुत गंदे होते हैं। अगर जल्द समाधान नहीं हुआ, तो मेस बंद होने की स्थिति आ सकती है।- दुलाल , कारीगर गैस नहीं मिलने से काम का पूरा सिस्टम बिगड़ गया है। सुबह चार बजे उठना पड़ता है और दिनभर थकान बनी रहती है। -नीलकमल, कारीगरकोयले पर खाना बनाना बहुत मुश्किल है, समय ज्यादा लगता है व मेहनत भी। गैस की आपूर्ति जल्द सामान्य होनी चाहिए।-अजय, कारीगरबर्तन साफ करने में बहुत समय लग रहा है, जिससे काम का सयम बढ़ गया है। आधे घंटे के काम अब एक घंटे में हो रहे हैं। -मुकेश, कारीगरपराठा बनाना लगभग बंद हो गया है, साधारण खाना ही बन पा रहा है। लजीज व्यंजन की मांग मेस से कर रह हैं, जो संभव नहीं है। -संदीप, कारीगर

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