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आद्रा नक्षत्र के चार दिन बीते, पर्याप्त बारिश नहीं होने से किसान निराश

आद्रा नक्षत्र के चार दिन बीतने के बाद भी खूंटी जिले में पर्याप्त बारिश नहीं हुई है। इस संबंध में हिन्दुस्तान ने कुछ विशेषज्ञों से बातचीत की है। कृषि...

आद्रा नक्षत्र के चार दिन बीते, पर्याप्त बारिश नहीं होने से किसान निराश
Newswrapहिन्दुस्तान टीम,रांचीSat, 25 Jun 2022 01:30 AM
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खूंटी, संवाददाता।

आद्रा नक्षत्र के चार दिन बीतने के बाद भी खूंटी जिले में पर्याप्त बारिश नहीं हुई है। इस संबंध में हिन्दुस्तान ने कुछ विशेषज्ञों से बातचीत की है। कृषि मौसम वैज्ञानिक डॉ. राजन चौधरी कहते हैं कि वर्षा पर निर्भर खेती में हमेशा अनिश्चितता बनी रहती है, क्योंकि वर्षा की तीव्रता तथा मात्रा पर मनुष्य का कोई वश नहीं चलता है। इसलिये इस प्रकार की खेती मे वर्षा ऋतु के आगमन से पूर्व ही कुछ व्यवस्थाएं करनी पड़ेंगी। उन्होंने कहा कि खेतों में ठूंठ छोड़ना तथा मृदा पर वनस्पतियों या घास के सघन आवरण को बनाए रखना तथा मृदा नमी की सुरक्षा करना एवं हानियों को रोकने के लिए जुताई, कोड़ाई का विकसित ढंग, मल्च तथा फसलोत्पादन की विकसित पद्धतियों का उपयोग आदि ऐसे कई उपायों को प्रयोग में लाना होगा। जिससे वर्षा से होने वाले भूरक्षण को कम करके वर्षा जल का अधिकतम उपयोग खेती मे किया जा सके। कम वर्षा वाले क्षेत्रों के किसानों को उन्होंने सुझाव दिया कि जलाभाव होने के कारण सूखा सहन करने वाले और शीघ्र परिपक्व होने वाली प्रभेदों के फसलों की खेती करें। किसान ऐसी खेती में धान में सहभागी धान, स्वर्नश्र्या, डीआरटी-1 आदि प्रभेदों का प्रयोग करना चाहिए। मृदा को अधिक ह्यूमस की मात्रा से समृद्ध करें, क्योंकि इससे उसकी जलधारण करने की क्षमता बढ़ती है और वह लंबे समय तक जल को रोक सकती है।

सब्जियों में वर्षा की कमी होने से बचाव : सब्जी स्तर के दौरान वर्षा में कमी के परिदृश्य में, किसानों को जल संरक्षण हेतु ड्रिप सिंचाई करने की तथा फल उपयोग दक्षता को बढ़ाने के लिए रुट-जोन पर अपेक्षित जल प्रदान करने की सलाह दी जाती है। वानस्पतिक वृद्धि के दौरान कोलीनाइट (5 प्रतिशत) का फोलिअर अनुप्रयोग वाष्पोत्सर्जन होने को कम करता है। वानस्पतिक वृद्धि स्तर के दौरान 15 दिनों के अंतराल पर चिपचिप पदार्थ के साथ-साथ प्रतिशत पोलिफ्रिड(19.19.19), अर्थात जल के 1 लीटर का 30 ग्रामों में पांच छिड़काव की संस्तुति की जाती है। काले पोलीथीन के साथ या पौध सामग्री, केले के पत्ते आदि के साथ मृदा सतह की मल्चिंग जल हानि को कम करने के लिए बेसिन को चारों तरफ फैलाया जा सकता है। पौधा एवं मल्चिंग के चारो तरफ हरी खाद फसल उगाना संस्तुत किया जाता है। खुली सिंचाई की बजाए, उप-सतह सिंचाई की संस्तुति की जाती है। प्रदान संस्था के विजय कुमार बीरू कहते हैं कि अभी बारिश कम हुई है, ऐसी स्थिति में किसान धान की सीधी बुआई विधि से धान की खेती कर सकते हैं। जिसमें किसानो को धान का बिचड़ा करने की आवश्यकता नहीं होगी। हालांकि सीधी बुआई में घास निकलने की संभावना होगी, लेकिन इसको विडर की सहायता से हटाया जा सकता है। इसके साथ दलहनी फसल के रूप में किसान अरहर, उरद की खेती कर सकते हैं। सब्जी के रूप में किसान लतर वाली फसलें ले सकते है। जैसे कद्दू, करेला, नेनुआ, खीरा इत्यादि इसके साथ ही कंद वाली फसल के रूप में ओल, कचु आदि की फसल ली जा सकती है।

प्रगतिशील किसान लक्ष्मण महतो कहते हैं कि किसान बेसब्री से बारिश का इंतजार कर रहे है। बारिश नहीं होने के कारण धान का बिचड़ा सही समय में नहीं डाल पा रहे है। जिन किसानों ने बिचड़ा डाला भी है, उनके बिचड़े खराब हो रहे हैं। बारिश नहीं के कारण स्वीट कार्न और बादाम का खेती बहुत ज्यादा प्रभावित हो रहा है। खूंटी जिला में स्वीट कॉर्न की खेती बड़े पैमाने पर होती है, लेकिन बारिश नहीं होने के कारण बोया गया बीज भी खराब हो रहा है। जिसके कारण किसान को आर्थिक नुकसान भी हो रहा है।

आत्मा के उपपरियोजना निदेशक अमरेश कुमार कहते हैं कि अभी घबराने की जरूरत नहीं है। खूंटी के मौसम के अनुसार यहां कभी भी जुलाई से पहले खरीफ फसलों की खेती सही तरिके से शुरू नहीं होती। उन्होंने बताया किसान अनुदानित बीज बड़े पैमाने ले गए हैं। कई किसानों ने बीचड़ा बोना प्रारंभ किया है। उन्होंने कहा कि बारिश के धोखा देने पर खूंटी में मडुआ और दलहनी फसल अच्छे विकल्प हैं।

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