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फादर कामिल बुल्के को कर्मभूमि की मिट्टी नसीब- VIDEO

रांची एयरपोर्ट से सजे वाहन में फादर कामिल बुल्के के अवशेष दर्शन के लिए लोगों की भीड़ उमड़ी। हिनू चौक, डोरंडा, मेनरोड में विभिन्न शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थी व आम लोग सड़क किनारे कतारबद्ध खड़े थे। गुदड़ी स्थित संत जोन्स स्कूल से लेकर मनरेसा हाउस तक मिशनरी संस्थानों के छात्र-छात्राओं ने शोभायात्रा निकाली और अवशेष को लेकर गुजरने वाले वाहन पर पुष्प वर्षा की। शोभायात्रा में संत जोन्स हाई स्कूल, संत जोन्स इंगलिश स्कूल, संत जेवियर्स स्कूल, संत अन्ना स्कूल, उसुलाईन कान्वेंट, संत अलबर्ट कॉलेज के छात्र-छात्राएं और धर्मबहनें शामिल थीं। कब्र की मिट्टी और अवशेष को पाइका नृत्य समूह दल के सदस्य पारंपरिक नृत्य की अगुवाई करते हुए आयोजन स्थल तक ले गए। आठ नगाड़ों की गूंज और छह तुरही की धुन पर भव्य स्वागत किया गया।

वंदे सच्चिदानन्दम, वंदे-वंदे... : मनरेसा हाउस में फादर बुल्के को श्रद्धांजलि के समय माहौल भक्तिमय हो गया। वंदे सच्चिदानन्दम-वंदे-वंदे सच्चिदानन्दम...के भजन से आयोजन स्थल गूंज उठा। इस दौरान सर्वप्रथम फादर मरियानुस ने पुष्प अर्पित किए और फादर फैड्रिक कुजूर ने अवशेष के ऊपर कफन कपड़ा रखा। इसके बाद मोमबत्ती और धूप-बत्ती जलाई गई। फादर अमृत ने पवित्र जल छिड़कर शुद्धिकरण की प्रक्रिया पूरी की। इसके उपरांत प्रार्थना सभा और डॉ. फादर कामिल बुल्के के जीवन पर व्याख्यान हुआ। अंत में उपस्थित लोगों ने क्रमवार पुष्प अर्पित करते हुए श्रद्धाजंलि दी। इस मौके पर संत जेवियर्स कॉलेज के प्राचार्य फादर निकोलस टेटे, कमल बोस, फादर एफ्रेम बा, इमानुवेल सांगा, रेव्ह. सिरिल हंस, नौशाद खान, फादर फ्लोरेंस कुजूर, पीपी शर्मा समेत कई लोग मौजूद थे।

राजरानी-बहुरानी... के साथ जी उठे बुल्के

फादर कामिल बुल्के हमेशा कहा करते थे- संस्कृत भाषाओं की राजरानी, हिन्दी बहुरानी और अंग्रेजी नौकरानी है...। वह ऐसा क्यों कहा करते थे, इसका स्मरण मनरेसा हाउस में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में साक्षात हो गया। सच्चिदोर्मेलन सरणमञ शुभ स्वसितानन्द घनम...। पावन जवन वाणी वदन जीवनदम...। वंदे... जैसे संस्कृत के भजन और हिन्दी में अपने विचारों को अलकृंत करने से मानो ऐसा प्रतीत हो रहा है था कि फादर कामिल बुल्के जी उठे हैं। संत साहित्यकार, भारतीय धर्म-संस्कृति के अध्येता तुलसी भक्त बाबा कामिल बुल्के का जीवनदर्शन जीवंत हो उठा है। उनका पार्थिव अवशेष रांची लाए जाने के यादगार लम्हे के साथ भाषाएं भी खुशी से झूम उठीं। यहां एक ही छत के नीचे ईसाई, हिन्दू, सिख और मुस्लिम धर्मावलंबी हिन्दी और संस्कृत के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हुए बुल्के के मूल उद्देश्यों को क्रियान्वित करने में अहम भूमिका निभा रहे थे। संस्कृत के भजन जहां हिन्दी भाषी सामूहिक रूप से गा रहे थे तो इस भजन को बेहतर ढंग से भारतीय पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ सुर से सुर मिलाने में ईसाई समुदाय के धर्मबंधु सहित सिस्टर भी पीछे नहीं थीं। डच और बेल्जियम के पुरोहितों को संस्कृत के भजन गाते देख लोग हतप्रभ थे।

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  • Web Title:Father Kamil Bullke soil of Karmabhoomi