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बोले रांची: उपसमाहर्ता ऑफिस में 5 साल से पट्टा-रसीद की फाइल रुकी

संक्षेप: रांची के नामकुम लालखटंगा के सबैय बगान गांव के विस्थापित 62 वर्षों से अपनी भूमि के मालिकाना हक से वंचित हैं। उन्हें 1962-63 में एचईसी परियोजना के तहत 20 डिसमिल भूमि दी गई थी, लेकिन पट्टा और लगान रसीद...

Wed, 15 Oct 2025 01:59 AMNewswrap हिन्दुस्तान, रांची
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बोले रांची: उपसमाहर्ता ऑफिस में 5 साल से पट्टा-रसीद की फाइल रुकी

रांची, संवाददाता। रांची जिला के नामकुम लालखटंगा के ग्राम सबैय बगान (न्यू धुर्वा) के विस्थापित आज भी अपने अधिकारों से वंचित हैं। हिन्दुस्तान के बोले रांची में स्थानियों ने बताया कि वर्ष 1962-63 में एचईसी परियोजना के लिए भूमि अधिग्रहण के बाद प्रत्येक विस्थापित परिवार को मुआवजे के रूप में 20 डिसमिल भूमि दी गई थी, लेकिन छह दशक बीत जाने के बावजूद मालिकाना हक का पट्टा नहीं मिला। एक हजार की आबादी वाले इस गांव में आजादी के 78 वर्ष बाद भी सड़क से लेकर पेयजल तक की समस्या है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले भी कई बार उपायुक्त और विधायक तक इस मुद्दे को उठाया था, लेकिन सिर्फ आश्वासन मिला।

लगभग 29 परिवारों के दस्तावेज उपसमाहर्ता कार्यालय में पिछले पांच वर्षों से अटके हुए हैं। न तो पट्टा निर्गत हुआ, न लगान रसीद। स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन से आग्रह किया है कि उनका पट्टा और लगान रसीद निर्गत किया जाए। कागजों में यह जमीन दी भी गई रांची के नामकुम प्रखंड के लालखटंगा मौजा अंतर्गत सबैय बगान (न्यू धुर्वा) के लोगों ने हिन्दुस्तान के बोले रांची के माध्यम से प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की ओर से की जा रही क्षेत्र की उपेक्षा और अधूरे वादों पर खुलकर बातें रखीं। स्थानियों ने कहा यह वही गांव है, जहां के लोगों ने 1959-60 में एचईसी परियोजना के लिए अपनी पुश्तैनी जमीन सरकार को दी थी। उन्हें आश्वासन दिया गया था कि पुनर्वास के तहत प्रत्येक विस्थापित परिवार को मौजा गढ़खटंगा में 20 डिसमिल भूमि मुआवजे के रूप में दी जाएगी। कागजों में यह जमीन दी भी गई, लेकिन आज तक किसी भी परिवार को उसका मालिकाना हक यानी बस्ती पट्टा या लगान रसीद नहीं मिली। कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही लोगों ने कहा कि विस्थापन के 62 साल बाद भी ग्रामीण अपने ही घर की जमीन के वैधानिक स्वामित्व से वंचित हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने वर्षों पहले एचईसी और भूमि राजस्व विभाग से संबंधित कागजात जमा कर दिए थे, यहां तक कि एचईसी प्रबंधन की ओर से इस संबंध में एक पत्र भी जारी किया गया था, जो आज भी उनके पास सुरक्षित है। लेकिन, जब तक उच्च स्तर से आदेश नहीं आता, खिजरी-नामकुम अंचल कार्यालय स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है। गांव के बुजुर्ग विस्थापित बताते हैं कि पहले भी कई बार उपायुक्त और विधायक तक इस मुद्दे को उठाया गया था, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन मिला। लगभग 29 परिवारों के दस्तावेज उपसमाहर्ता कार्यालय में पिछले पांच वर्षों से अटके हुए हैं। न तो पट्टा निर्गत हुआ, न लगान रसीद। उन्होंने कहा कि मन में लोगों के भय समा गया है कि कहीं भविष्य में उनकी बसावट भूमि पर कोई और दावा न कर दे। मालिकाना हक का संकट सबै‍य बगान के ग्रामीणों की सबसे बड़ी समस्या उनकी भूमि पर मालिकाना हक न होना है। लोगों ने बताया कि एचईसी द्वारा भूमि अधिग्रहण के बाद प्रत्येक विस्थापित परिवार को मुआवजे के रूप में 20 डिसमिल जमीन दी गई थी। लेकिन, आज तक किसी को बस्ती पट्टा या लगान रसीद नहीं मिली। इससे ग्रामीणों में असुरक्षा की भावना गहरी है। बिना दस्तावेज के वे न तो मकान निर्माण के लिए सरकारी सहायता ले सकते हैं, न ही बैंक से लोन। कई बार आवेदन और पत्राचार के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं हुई। इस भूमि के आधार पर उनका कोई सरकारी दस्तावेज भी नहीं बन पाता है। लोगों ने कहा कि 29 कागजात सरकारी कार्यालय में वर्षों से लंबित हैं। जबकि, एचईसी की स्वीकृति पत्र भी उनके पास मौजूद है। सड़क और संपर्क व्यवस्था की बदहाली सबै‍य बगान तक पहुंचने के लिए अब तक कोई पक्की सड़क नहीं बनी। बारिश के दिनों में रास्ते कीचड़ में बदल जाते हैं, जिससे स्कूल, अस्पताल या बाजार तक पहुंचना मुश्किल होता है। यह समस्या केवल सुविधा की नहीं बल्कि आपात स्थिति में जानलेवा भी बन जाती है। पूर्व मुखिया रितेश उरांव ने बताया कि सड़क निर्माण के लिए कई बार तकनीकी स्वीकृति मिली, लेकिन टेंडर प्रक्रिया अधूरी रह गई। पंचायत फंड की कमी और विभागीय देरी के कारण काम अटका हुआ है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि आजादी के 78 साल बाद भी गांव तक पक्की सड़क नहीं पहुंचना शर्मनाक है। समस्याएं 1. 62 साल से विस्थापितों को उनकी जमीन का पट्टा नहीं मिला। 2. पेयजल संकट गंभीर, केवल एक बोरिंग है, वो भी अधिकतर समय खराब रहता है। 3. गांव में सड़क नहीं, पक्की सड़क नहीं होने से लोगों को आने-जाने में कठिनाई। 4. जाति और स्थानीय प्रमाण पत्र बनवाने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है। 5. बिजली, शौचालय और सामुदायिक भवन का अभाव, मूलभूत सुविधाएं नहीं। सुझाव 1. विस्थापितों को बस्ती पट्टा और लगान रसीद त्वरित निर्गत की जानी चाहिए। 2. गांव तक पक्की सड़क बननी चाहिए और जलनिकासी व्यवस्था की जाए। 3. विधायक फंड से डीप बोरिंग और जलटंकी लगाई जाए, जिससे पेयजल की समस्या दूर हो। 4. प्रमाण पत्र निर्गत प्रक्रिया में विस्थापितों के लिए विशेष शिविर लगाए जाएं। 5. गांव में स्ट्रीट लाइट, सार्वजनिक शौचालय और सामुदायिक भवन का निर्माण कराया जाए। किसने क्या कहा हमने 1959 में अपनी जमीन एचईसी को दी थी, बदले में पुनर्वास का वादा किया गया था। 20 डिसमिल जमीन तो मिली, लेकिन उसका मालिकाना हक आज तक नहीं मिला। बिना पट्टा हम न घर सुधार सकते हैं, न लोन ले सकते हैं। हर साल कागज लेकर अंचल कार्यालय जाते हैं, लेकिन फाइलें वहीं पड़ी रहती हैं। विभाग जल्द पहल कर हमारा हक हमें दें। -रितेश उरांव हमारे गांव तक आज भी पक्की सड़क नहीं पहुंची। बरसात में पूरा रास्ता कीचड़ में डूब जाता है। बीमार को अस्पताल ले जाना मुश्किल हो जाता है। कई बार सड़क स्वीकृत हुई, पर काम कभी पूरा नहीं हुआ। आजादी के 78 साल बाद भी सड़क नहीं बन पाना दुर्भाग्यपूर्ण है। सड़क के लिए कई बार तकनीकी स्वीकृति मिली, लेकिन टेंडर प्रक्रिया अधूरी रह गई। -पुष्पा तिर्की बुढ़ापे में भी हमें अपनी जमीन का मालिकाना नहीं मिला। न लगान रसीद है। डर है कि भविष्य में किसी और को मालिकाना हक न मिल जाए। -बुकना बिहा युवाओं के लिए सबसे बड़ी दिक्कत प्रमाणपत्र का नहीं मिलना है। बिना जमीन दस्तावेज के आवासीय, जाति प्रमाणपत्र नहीं बनता। -दीपक कुमार महतो महिलाएं पानी की सबसे बड़ी मार झेलती हैं। एक हैंडपंप है, जो अक्सर खराब रहता है। गर्मी में पानी के लिए दो किलोमीटर दूर तक जाना पड़ता है। -खुदन एक्का हमारे गांव तक आज भी पक्की सड़क नहीं पहुंची। बरसात में पूरा रास्ता कीचड़ में डूब जाता है। लोगों को आवागमन में दिक्कत होती है। -सुनिता कच्छप आवासीय, स्थानीय प्रमाणपत्र नहीं होने के कारण वे छात्रवृत्ति से वंचित हैं। कई लड़कियां पढ़ाई बीच में छोड़ देती हैं। -रंजीता कच्छप हम विस्थापित होकर भी अधिकारविहीन रह गए। जमीन मिली, पर कागज नहीं। खेती करना भी कठिन है। यहां सरकारी सुविधा नहीं पहुंचती। -लाडो कच्छप जब भी कोई योजना आती है, तो विभाग द्वारा जमीन का रिकॉर्ड नहीं होने के कारण योजना का लाभ नहीं मिलता है। -रामसेवक महतो हमारे गांव के दस्तावेज उपसमाहर्ता कार्यालय में वर्षों से अटके हैं। हर बार कहा जाता है कि जल्द निपटारा होगा, पर कुछ नहीं होता। -बांधनी तिर्की हर गर्मी में पानी के लिए जंग लड़नी पड़ती है। एक बोरिंग है, जो अक्सर सूख जाती है। विधायक निधि से बोरिंग लगाई जाए। -सुनिता कच्छप हमारा गांव शहर से बस कुछ किलोमीटर दूर है। लेकिन गांव का हाल बदहाल है। न सड़क, न लाइट, न पानी और न सरकारी सुविधा मिलती है। -बरतु उरांव