
राज्य में शासन व्यवस्था को निष्पक्ष और पारदर्शी होना जरूरी : मरांडी
संक्षेप: बाबूलाल मरांडी ने उठाए सरकार की कार्यशैली पर सवाल, फर्जी मुकदमे, पदस्थापन नीति और पुलिस पदक चयन पर टिप्पणी
रांची, हिन्दुस्तान ब्यूरो भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने झारखंड सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में शासन व्यवस्था को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए रखने की दिशा में कई बिंदुओं पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। मरांडी ने पहला सवाल मुकदमों को फर्जी बताकर उठाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य के कुछ थाना क्षेत्रों में सामान्य विवादों को आपराधिक रंग देकर अनुचित कार्रवाई की जा रही है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने पतरातू का मामला सामने रखा, जहां एक दुकानदार पर मामूली विवाद के बाद आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया।

मरांडी का कहना है कि ऐसे मामलों से पुलिस की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं और आम नागरिक का भरोसा प्रभावित होता है। आरोप लगाया कि कुछ पुलिस अधिकारी बिहार की रंजिश का बदला झारखंड में मुकदमा दर्ज कर ले रहे हैं। एक वन अधिकारी पर पांच पदों की जिम्मेदारी, आठ अफसर प्रतिक्षारत दूसरा मुद्दा उन्होंने वन विभाग में पदस्थापन नीति से जोड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि वन विभाग में एक वरिष्ठ अधिकारी को पांच महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी एक साथ सौंप दी गई है, जबकि आठ प्रशिक्षु आईएफएस अधिकारी वेटिंग फॉर पोस्टिंग की स्थिति में हैं। उन्होंने 2011 बैच के आईएफएस अधिकारी सबा आलम अंसारी का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्हें एक साथ पांच पदों की जिम्मेदारी दी गई है। मरांडी के अनुसार ऐसे निर्णयों से कार्यकुशलता प्रभावित होती है और विभागीय संतुलन पर असर पड़ता है। यह स्थिति प्रशासनिक दृष्टि से अनुचित है, क्योंकि यह व्यवस्था हितों के टकराव की स्थिति उत्पन्न करती है। पुलिस पदक सूची को लेकर सवाल तीसरे बिंदु में उन्होंने पुलिस पदक सूची को लेकर सवाल किया। मरांडी ने कहा कि सराहनीय सेवा पदक पाने वाले कर्मियों के चयन में पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। उन्होंने जैप-2 के आरक्षी रणजीत राणा का नाम लेते हुए कहा कि यदि किसी कर्मी की सेवा रिकॉर्ड पर मतभेद है, तो ऐसे मामलों में जांच और समीक्षा जरूरी है। मरांडी के अनुसार रणजीत राणा, जो जैप-2 के आरक्षी हैं, लंबे समय से किसी नक्सल अभियान में सक्रिय नहीं रहे, बल्कि वर्ष 2015 से एक वरिष्ठ अधिकारी के अधीन कंप्यूटर ऑपरेटर के रूप में कार्यरत रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि उक्त अधिकारी से जुड़े विवादों और जांचों में राणा का नाम सहयोगी के रूप में सामने आता रहा है। उन्होंने कहा कि यदि यह चयन किसी प्रशासनिक भूल या अपूर्ण जानकारी के कारण हुआ है, तो मुख्यमंत्री को इस पर ध्यान देना चाहिए और आवश्यक सुधार करना चाहिए।

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