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ठनके की जद में हैं राजधानी समेत झारखंड के 15 जिले

झारखंड के पठारी प्रदेश होने की वजह से यहां वज्रपात का सर्वाधिक असर होता है। राज्य में वज्रपात (ठनका) से औसतन दो सौ लोग हर साल असमय मारे जाते हैं। 
इस साल पहली मई महीने से लेकर जून की पहली तारीख तक 70 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। यह वैसे आंकड़ें हैं, जिसकी रिपोर्ट हुई है। रिपोर्ट नहीं होनेवाली घटनाओं में मृतकों की संख्या इससे कहीं ज्यादा है। 
सर्वेक्षण के तहत वज्रपात से सर्वाधिक प्रभावित जिलों की श्रेणी (लेवल- एक) में राज्य के 24 में से 15 जिले हैं। इनमें रांची, पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम के अलावा सरायकेला खरसावां, रामगढ़, खूंटी, चतरा, लातेहार, कोडरमा, हजारीबाग, दुमका और देवघर जिला शामिल हैं। बाकी नौ जिले लेवल-दो में आते हैं। इन जिलों में वज्रपात का असर अपेक्षाकृत कम दिखाई पड़ता है।
तड़ित अवरोधक कारगर: आपदा प्रबंधन विभाग ने पिछले साल वज्रपात से लोगों को बचाने के लिए कई कदम उठाए थे। एक नया उपकरण तड़ित अवरोधक (तड़ित चालक नहीं) का उपयोग किया। इससे आकाशीय बिजली के धरती पर गिरने की तीव्रता को क्षेत्र विशेष में शून्य किया जा सकता है। यह टीवी एंटिना की तरह होता है। अपने  स्थान के ईद-गिर्द 507 मीटर ब्यास और 1014 वर्गमीटर क्षेत्र में ठनका को निष्प्रभावी कर देता है।
सुरक्षित ग्रिड: बाबाधाम  देवघर, रांची हवाई अड्डा, जेएससीए स्टेडियम में यह उपकरण लगाया गया है। इस साल नामकुम के राजा उलातू को भी सुरक्षित ग्रिड बनाया जाना है। 
बचाव के उपाय
एक विशेष एप से ठनका गिरने की अग्रिम सूचना मिल जाती है। यह एप तीन से चार घंटे पहले बता देता है कि ठनका किस इलाके में गिर सकता है। आपदा प्रबंधन विभाग इस सूचना को संबंधित पंचायत, जिला अधिकारी और टीवी-रेडियो के माध्यम से लोगों को सचेत कर सकता है।
कैसे गिरता है ठनका
बादल से बादल के टकराने या बादल का ऊंची पहाड़ी से टकराने पर बिजली कड़कती है। झारखंड पठारी इलाका है। यहां बादल पहाड़ों की ऊंचाई तक होते हैं। बादल संघनित जल होता है। जल का रासायनिक फार्मूला एचटूओ होता है। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के विखंडन से नकारात्मक ऊर्जा पैदा होती है, जो सकारात्मक ऊर्जा के लिए पृथ्वी की ओर आकर्षित होती है। यही ठनका गिरना या वज्रपात होता है। राज्य सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग में सलाहकार रहे विशेषज्ञ कर्नल संजय श्रीवास्तव ने बताया कि इस साल ठनके का असर कुछ ज्यादा दिखाई दे रहा है।
जागरुकता जरूरी
जनजागरुकता अभियान से 2015-16 में ठनका से मरनेवालों की संख्या में काफी कमी आयी थी। 2014-15 में यह संख्या 204 थी, वहीं 2015-16 में 126 हो गई। लेकिन अब जागरुकता की कमी के कारण फिर से मरनेवालों की संख्या बढ़ने की आशंका है।  

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  • Web Title:15 districts of Jharkhand are in threat of thundring