कर्मकांड से नहीं, आत्मबोध से मिलती है मुक्ति : स्वामी युगल शरण
रामगढ़ में ब्रज गोपिका सेवा मिशन द्वारा आयोजित 21 दिवसीय प्रवचन श्रृंखला के 13 वें दिन, स्वामी युगल शरण ने कर्म मार्ग पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कर्म-धर्म का पालन करना आवश्यक है, लेकिन केवल इससे परम लक्ष्य की प्राप्ति संभव नहीं है। उन्होंने निषिद्ध कर्मों के त्याग और सात्त्विक कर्मों के पालन पर जोर दिया।

रामगढ़, निज प्रतिनिधि छावनी फुटबॉल मैदान में ब्रज गोपिका सेवा मिशन की ओर से आयोजित 21 दिवसीय प्रवचन श्रृंखला के 13 वें दिन गुरुवार को पूज्य स्वामी युगल शरण ने कर्म मार्ग पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि केवल कर्म-धर्म के पालन से परम लक्ष्य की प्राप्ति संभव नहीं है। मुण्डकोपनिषद् के श्लोक “परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन” का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि आध्यात्मिक मनीषियों ने अनुभव किया है कि कर्म से अधिकतम स्वर्ग की प्राप्ति होती है, ब्रह्म की नहीं। स्वामी जी ने कहा कि यज्ञादि कर्म रूपी पुल को “अदृढ़” बताया गया है-“प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा”-अर्थात कर्मकांड के सहारे माया से मुक्ति संभव नहीं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि निषिद्ध कर्म जैसे झूठ, अत्याचार, भ्रष्टाचार और चोरी का त्याग सभी के लिए अनिवार्य है। वहीं सात्त्विक या वैदिक कर्म, जिन्हें धर्म और पुण्य कहा जाता है, श्रुति-स्मृति के अनुसार पालन योग्य हैं। उन्होंने कर्मों को चार भागों-नित्य, नैमित्तिक, काम्य और प्रायश्चित-में विभाजित करते हुए समझाया कि नित्य कर्म कर्तव्य हैं, नैमित्तिक विशेष अवसरों पर किए जाते हैं, काम्य कर्म इच्छा पूर्ति हेतु और प्रायश्चित अनजाने में हुए पापों के प्रायश्चन के लिए होते हैं। स्वामी जी ने कहा कि कर्मकांड अत्यंत जटिल है, जिसमें देश, काल, द्रव्य, कर्ता, मंत्र और विधि-इन छह तत्वों की शुद्धता आवश्यक है। त्रुटि होने पर फल नहीं मिलता, बल्कि दंड का भागी बनना पड़ता है। उन्होंने कहा कि कलियुग में इन नियमों का पूर्ण पालन लगभग असंभव है। अतः सच्ची मुक्ति के लिए आत्मबोध और भक्ति का मार्ग ही श्रेष्ठ है।
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