रामगढ़ शहर में सरहुल महोत्सव सह मिलन समारोह का भव्य आयोजन, हजारों की सहभागिता
रामगढ़ में रविवार को आदिवासी छात्र संघ द्वारा सरहुल महोत्सव का भव्य आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में 10,000 से अधिक प्रकृति प्रेमियों ने भाग लिया। शोभायात्रा के दौरान लोग पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए। आयोजकों ने सरहुल पर्व के महत्व और समाज की एकता पर जोर दिया। अंत में सभी ने पूजा-अर्चना की।

रामगढ़, निज प्रतिनिधि रामगढ़ जिला स्तरीय आदिवासी छात्र संघ जिला कमेटी की ओर से रविवार को सरहुल महोत्सव सह मिलन समारोह का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम का नेतृत्व जिलाध्यक्ष सुनील मुंडा ने किया। इस अवसर पर दस हजार से अधिक प्रकृति प्रेमियों और आदिवासी समाज के लोगों की उल्लेखनीय भागीदारी रही, जिससे पूरा शहर उत्सवमय हो उठा। कार्यक्रम की शुरुआत जिला मैदान से भव्य शोभायात्रा के साथ हुई। यह शोभायात्रा चट्टी बाजार, गोलपार, थाना चौक होते हुए सुभाष चौक पहुंची, जहां यह एक विशाल सभा में तब्दील हो गई। शोभायात्रा के दौरान महिला, पुरुष, बच्चे, बच्चियां पारंपरिक वेशभूषा में सुसज्जित होकर ढोल-नगाड़ों की थाप पर गीत और नृत्य प्रस्तुत करते हुए आगे बढ़ रहे थे।
पूरे मार्ग में लोगों ने इस सांस्कृतिक आयोजन का स्वागत किया और जगह-जगह श्रद्धा व उत्साह का माहौल देखने को मिला। सभा को संबोधित करते हुए आयोजकों ने सरहुल पर्व के महत्व पर प्रकाश डालते हुए इसे प्रकृति और पर्यावरण के प्रति आस्था का प्रतीक बताया। उन्होंने समाज की एकता और सांस्कृतिक धरोहर को सहेजने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। समारोह में सुनील मुंडा (जिलाध्यक्ष), प्रमोद करमाली, प्रकाश करमाली, कोयलांचल प्रभारी छोटेलाल करमाली, प्रवक्ता अशोक करमाली, धर्मगुरु राजेश पाहन, सुदेश उरांव, सुभाष उरांव, धर्मगुरु संदीप टोप्पो, पवन मुंडा, दीपक उरांव,रवि मुंडा, भरत उरांव, धनेश्वर तिर्की, पंकज करमाली, सुकेश करमाली, अखिलेश करमाली, पवन मुंडा, श्रीवास्तव मुंडा, जगरन्नाथ मुंडा, गणेश पहान, प्रमोद मुंडा, दीपक मुंडा, सुभाष मुंडा, शशि करमाली, तरूण मुंडा, सुभाष मुंडा, विक्की आदिवासी, आर्य मुंडा, राजेश पाहन, विक्की मुंडा, श्रवण मुंडा, रवि मुंडा, रंजीत मुंडा, गुंजन मुंडा, आनंद मुंडा, अजीत मुंडा, ललित करमाली, संदीप प्रधान, राजेश मुंडा, छोटू करमाली, सोनू मुंडा, काशी बेदिया सहित कई कार्यकर्ता शामिल रहे। अंत में सभी ने मिलकर सरहुल पर्व की पारंपरिक विधि से पूजा-अर्चना की और समाज की खुशहाली, समृद्धि एवं एकता की कामना की। यह आयोजन न केवल सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बना, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए अपनी परंपराओं को संजोने का संदेश भी दे गया।
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