जंग की तपिश में ट्रांसपोर्ट और निर्माण कार्य ठप होने की कगार पर, डीजल संकट से बढ़ी चिंता

हिन्दुस्तान, रामगढ़
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जंग की तपिश में ट्रांसपोर्ट और निर्माण कार्य ठप होने की कगार पर, डीजल संकट से बढ़ी चिंता

रामगढ़, एक प्रतिनिधि। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी तनाव और युद्ध की स्थिति का असर अब स्थानीय अर्थव्यवस्था पर गहराता जा रहा है। जंग की तपिश के बीच रामगढ़ जिले में ट्रांसपोर्टिंग और बिल्डिंग वर्क से जुड़ी कंपनियों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। जिले के कई पेट्रोल पंपों पर डीजल की आपूर्ति मांग के अनुरूप नहीं हो पा रही है। जिसके कारण बार-बार डीजल खत्म होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। इसका सीधा असर परिवहन, निर्माण कार्य और उससे जुड़े हजारों लोगों की आजीविका पर पड़ रहा है। पेट्रोल पंप संचालकों का कहना है कि तेल कंपनियां इन दिनों विभिन्न प्रकार की पाबंदियां लगाकर डीजल की बिक्री को सीमित करने का दबाव बना रही हैं।

आपूर्ति में कटौती के कारण पंपों पर स्टॉक जल्दी खत्म हो रहा है। खासकर फोरलेन और हाईवे किनारे स्थित पेट्रोल पंपों पर स्थिति अधिक गंभीर बनी हुई है। जहां भारी वाहनों की आवाजाही ज्यादा रहती है। मांग अधिक होने के बावजूद आपूर्ति सीमित होने से हालात लगातार बिगड़ रहे हैं। बाजार में डीजल की इस कमी ने ट्रांसपोर्टिंग व्यवसाय से जुड़े लोगों को चिंता में डाल दिया है। ट्रांसपोर्टर, वाहन चालक, हेल्पर, गैरेज संचालक और ऑटो पार्ट्स की दुकानों से जुड़े लोग सभी इस स्थिति से प्रभावित हो रहे हैं। हर किसी को अपनी रोजी-रोटी पर संकट का भय सता रहा है। कई ट्रांसपोर्टरों का कहना है कि यदि समय पर डीजल नहीं मिला तो उन्हें अपने वाहन खड़े करने पड़ेंगे। जिससे उनकी आय पूरी तरह बंद हो सकती है। पेट्रोल पंप संचालकों ने इस संकट के पीछे एक और बड़ा कारण बताया है। उनके अनुसार तेल कंपनियों को प्रति लीटर करीब 20 रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। बताया जा रहा है कि कई राज्यों में चल रहे विधानसभा चुनाव को देखते हुए केंद्र स्तर पर पेट्रोलियम कंपनियों पर दबाव है कि वे आम जनता को नियंत्रित दर पर ही तेल उपलब्ध कराएं। भले ही उन्हें नुकसान क्यों न उठाना पड़े। ऐसे में कंपनियां अपने नुकसान को कम करने के लिए तेल की आपूर्ति सीमित कर रही हैं। संचालकों का यह भी कहना है कि कुछ तेल कंपनियां उन्हें एक तरह का विकल्प भी दे रही हैं। कंपनियां यह प्रस्ताव रख रही हैं कि यदि पंप संचालक कम तेल उठाते हैं या नहीं भी उठाते हैं तो भी उन्हें पिछले महीनों के औसत के आधार पर मासिक कमीशन दिया जाएगा। हालांकि संचालकों का मानना है कि यह व्यवस्था व्यावहारिक नहीं है। क्योंकि यदि पंप पर डीजल ही उपलब्ध नहीं होगा तो ग्राहकों का आना बंद हो जाएगा और लंबे समय में उनका व्यवसाय खत्म हो सकता है। डीजल की कमी का सबसे अधिक असर निर्माण कार्यों पर पड़ रहा है। पहले बड़े निर्माण प्रोजेक्ट्स में लगे वाहनों और मशीनों को सीधे साइट पर ही डीजल उपलब्ध करा दिया जाता था। इन भारी वाहनों का माइलेज कम होता है। इसलिए उन्हें लगातार ईंधन की जरूरत होती है। लेकिन अब बल्क आपूर्ति पर लगी रोक के कारण ऐसे वाहन भी पेट्रोल पंपों पर निर्भर हो गए हैं। इससे पंपों पर दबाव और बढ़ गया है। स्थिति यह हो गई है कि जो बड़े वाहन पहले कभी पेट्रोल पंप पर नजर नहीं आते थे। वे अब लंबी कतारों में खड़े दिख रहे हैं। इससे छोटे वाहन चालकों और आम उपभोक्ताओं को भी परेशानी हो रही है। निर्माण कंपनियों का कहना है कि डीजल की अनिश्चित आपूर्ति के कारण कई प्रोजेक्ट्स की गति धीमी हो गई है। जिससे समय और लागत दोनों बढ़ रहे हैं। इस पूरे संकट ने स्थानीय अर्थव्यवस्था की जड़ तक असर डाला है। परिवहन और निर्माण क्षेत्र से जुड़े हजारों लोग अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रहे हैं। यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो रोजगार का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। फिलहाल इस समस्या का कोई स्पष्ट समाधान नजर नहीं आ रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जारी अनिश्चितता, तेल कंपनियों की नीतियां और स्थानीय स्तर पर बढ़ती मांग इन सभी कारकों ने मिलकर स्थिति को जटिल बना दिया है। प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए है। लेकिन जमीन पर हालात सामान्य होने में अभी समय लग सकता है। जंग की तपिश का असर अब आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी और रोजगार पर सीधे तौर पर दिखने लगा है। डीजल की कमी ने ट्रांसपोर्टिंग और निर्माण कार्यों की रफ्तार को धीमा कर दिया है। जिससे आने वाले दिनों में चुनौतियां और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

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