आरोप: डब्ल्यूबीपीडीसीएल व पीएसपीसीएल के लिए नहीं हुआ जमीन का अधिग्रहण
- अगर जमीन का हुआ अधिग्रहण और मिला मुआवजा तो रिकॉर्ड दिखाए प्रशासन व कंपनी... आरोप: डब्ल्यूबीपीडीसीएल व पीएसपीसीएल के लिए नहीं हुआ जमीन का अधिग्रहण

'पचुवाड़ा कोयला खदान विस्थापित मोर्चा' के बैनर तले पचुवाड़ा मध्य व उत्तर कोल ब्लॉक के प्रभावित रैयतों और आदिवासियों का समाहरणालय के समक्ष अनिश्चितकालीन धरना सोमवार को चौथे दिन भी जारी रहा। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे मोहन मुर्मू, मुन्नी हांसदा और मेरीलींना सोरेन ने जिला प्रशासन सहित खनन कंपनियों पीएसपीसीएल व डब्लूबीपीडीसीएल के खिलाफ तीखा आक्रोश व्यक्त किया। बड़ी संख्या में जुटे ग्रामीणों और विस्थापितों की मौजूदगी को देखते हुए समाहरणालय परिसर में पुलिस बल अलर्ट मोड पर रहा। केंद्रीय कानून के तहत विस्थापितों ने जमीन का चार गुना मुआवजा देने, प्रभावित परिवारों को सरकारी रोल पर नौकरी या ₹1.20 करोड़ की एकमुश्त राशि देने, और स्थानीय उप-ठेकेदारी में 10 से 15 प्रतिशत प्राथमिकता देने की मांग की है। मुन्नी हांसदा व एडवोकेट दीपक कुमार सिंह ने कहा कि पाकुड़ जिला भू-अर्जन कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि वेस्ट बंगाल पावर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड और पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड के लिए पाकुड़ जिले में भू-अर्जन अधिनियम 2013 के तहत किसी भी भूमि का अर्जन नहीं किया गया है।
आंदोलनकर्ताओं की मांगें
मुन्नी हांसदा ने कहा कि पचुआड़ा सेंट्रल कोल ब्लॉक पहले पंजाब स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड को और 2005 में पचवारा नॉर्थ कोल ब्लॉक डब्लूबीपीडीसीएल को आवंटित हुआ था। इन आवंटन पत्रों में किसी तीसरी एजेंसी या निजी इकाई का कोई जिक्र नहीं है। कोयला मंत्रालय या राज्य सरकार के रिकॉर्ड में भी ऐसा कुछ नहीं है, लेकिन इसके बावजूद गलत तरीके से पूर्व में जमीन प्रभावितों के नाम से दिखाई गई। जब उपायुक्त कार्यालय और भू-अर्जन कार्यालय खुद लिखित में दे रहे हैं कि इन दोनों सरकारी कंपनियों के लिए कोई भूमि अधिग्रहण हुआ ही नहीं, तो फिर यह खनन कैसे चल रहा है? उन्होंने आगे तकनीकी पहलू स्पष्ट करते हुए कहा कि नियमतः यदि किसी सरकारी कंपनी के लिए कोयला खनन हेतु भूमि का अधिग्रहण होता है, तो वह भारत सरकार के 'कोल बेयरिंग एरियाज एक्विजिशन एंड डेवलपमेंट एक्ट' के तहत होना चाहिए, जिसमें राज्य सरकार के पास सीधे अधिकार नहीं होते। बिना पूर्ण व उचित भूमि अधिग्रहण के ही कठालडीह, चिलगो, बीसनपुर और पचुवाड़ा जैसे क्षेत्रों में निजी जमीनों से कोयला निकाला जा रहा है, जो रैयतों के साथ सरासर धोखाधड़ी है।
उग्र आंदोलन की चेतावनी
आंदोलनकर्ताओं ने दी उग्र आंदोलन की चेतावनी...
विस्थापित नेता मोहन मुर्मू ने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के स्पष्ट आदेश के बावजूद जिला प्रशासन समन्वय बैठक नहीं करा रहा है। इसके साथ ही, वर्ष 2025 से ही बारूद मैगजीन का लाइसेंस अवैध होने के बावजूद खदान क्षेत्र में भारी ब्लास्टिंग की जा रही है, जिससे आदिवासियों की जमीनें और पर्यावरण बर्बाद हो रहे हैं। नेताओं ने कहा कि स्थानीय कुछ बिचौलियों को महज चंद रुपियों और साइकिल का लालच देकर, डंपर-डोजर के दम पर उन्हें उनकी ही जमीन से उजाड़ने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं। यहां अफसरों और कंपनियों की मिलीभगत से कोयला लूटने का खेल चल रहा है। विस्थापित नेताओं ने हेमंत सरकार और स्थानीय प्रशासन को दो टूक चेतावनी देते हुए कहा कि यदि हमारी जायज मांगों का जल्द समाधान नहीं निकाला गया, तो यह शांतिपूर्ण आंदोलन उग्र रूप धारण कर लेगा। कोयला उत्खनन व ट्रांसपोर्टिंग का काम पूरी तरह ठप कर दिया जाएगा। सोमवार को हुए इस विरोध प्रदर्शन में देवेंद्र डेहरी, प्रेमलाल मुर्मू, रानी हांसदा, लखीराम मुर्मू, चैतर हेंब्रम, सोना हेंब्रम, मालूकी मरांडी, मसोनी मरांडी, ओपनमय हेंब्रम सहित सैकड़ों की संख्या में प्रभावित ग्रामीण और महिला-पुरुष मुस्तैदी से डटे रहे।
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