सच्ची मित्रता पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति से होती है परे : प्रीति रामानुज
महेशपुर के सुंदरपुर गांव में श्रीमद्भागवत कथा का भावपूर्ण समापन हुआ। कथा में सुदामा चरित्र, राजा परीक्षित का मोक्ष और शुकदेव जी की विदाई के प्रसंग ने श्रद्धालुओं को भावुक किया। कथा में भक्ति और श्रद्धा का सागर उमड़ा। आयोजन के अंत में भजन-कीर्तन और प्रसाद वितरण का कार्यक्रम रखा गया।

महेशपुर, एक संवाददाता। प्रखंड के सुंदरपुर गांव में विगत कई दिनों से चल रही श्रीमद्भागवत कथा शनिवार संध्या अत्यंत भावपूर्ण एवं आध्यात्मिक वातावरण में संपन्न हुई। कथा के अंतिम चरण में सुदामा चरित्र की करुणा, राजा परीक्षित के मोक्ष की दिव्य गाथा तथा परम तपस्वी शुकदेव जी की विदाई के मार्मिक प्रसंग ने श्रद्धालुओं को भक्ति और भावनाओं के सागर में डुबो दिया। संध्या से लेकर देर रात तक कथा पंडाल में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी रही और पूरा क्षेत्र राधे-श्याम, जय श्रीकृष्ण तथा भागवत महाराज की जय के जयघोष से गुंजायमान रहा। अंतर्राष्ट्रीय कथावाचिका पूज्य प्रीति रामानुज जी ने सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि सच्ची मित्रता पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति से परे होती है।
भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता त्याग, प्रेम और आत्मीयता का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने बताया कि निर्धन ब्राह्मण सुदामा जब द्वारिका पहुंचे तो भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं दौड़कर उनका स्वागत किया और चरण धोकर अपने सखा के प्रति सम्मान प्रकट किया। यह प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो उठे। कथावाचिका ने कहा कि जो हृदय से भगवान को याद करता है, उसके जीवन की दरिद्रता भी प्रभु की कृपा से दूर हो जाती है। इसके पश्चात राजा परीक्षित के मोक्ष का दिव्य प्रसंग प्रस्तुत किया गया। कथावाचिका ने बताया कि मृत्यु निश्चित जानकर भी राजा परीक्षित ने सांसारिक मोह का त्याग कर सात दिनों तक श्रीमद्भागवत का श्रवण किया और अंततः मोक्ष को प्राप्त हुए। उन्होंने कहा कि जीवन क्षणभंगुर है, परंतु सत्संग और भगवान की कथा अमरत्व का मार्ग प्रशस्त करती है। इस प्रसंग ने श्रद्धालुओं को जीवन के सत्य से परिचित कराया और धर्म, भक्ति एवं सत्कर्म की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा दी। कथा के अंतिम चरण में शुकदेव जी की विदाई का अत्यंत भावुक वर्णन हुआ। शुकदेव जी द्वारा राजा परीक्षित को ज्ञानामृत पिलाकर गंगा तट से प्रस्थान करने की लीला का वर्णन सुनकर कई श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं। कथा पंडाल में कुछ क्षणों के लिए गहरा भावनात्मक वातावरण छा गया। कथावाचिका ने कहा कि गुरु और शिष्य का संबंध आत्मा से आत्मा का संबंध होता है, जो समय और परिस्थिति से परे होता है। शनिवार की संध्या को कथा को विधिवत विश्राम दिया गया। समापन अवसर पर भजन-कीर्तन, आरती और पुष्पांजलि के साथ श्रद्धालुओं ने भगवान के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की। आयोजन समिति के सदस्यों ने बताया कि रविवार को श्रीमद्भागवत कथा पूर्णाहुति के साथ संपन्न होगी तथा हवन-पूजन के उपरांत विशाल भंडारा एवं प्रसाद वितरण का आयोजन किया जाएगा, जिसमें आसपास के गांवों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। कई दिनों तक चले इस आध्यात्मिक महायज्ञ ने सुंदरपुर गांव को भक्ति, संस्कृति और सामाजिक एकता के सूत्र में पिरो दिया। प्रतिदिन उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़ और भक्तिमय वातावरण ने यह सिद्ध कर दिया कि आज भी ग्रामीण अंचल में धर्म और संस्कृति की जड़ें गहराई से स्थापित हैं। शनिवार की यह संध्या सुंदरपुर के लिए केवल कथा का समापन नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण, श्रद्धा और भक्ति के नवसंकल्प का प्रतीक बनकर उपस्थित श्रद्धालुओं के हृदय में सदैव स्मरणीय रहेगी।
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